अमेरिका के न्यूयार्क शहर में योग करने से होने वाले लाभ के बारे में लोगों को जागरूक करना योग के प्रति इनकी दृढ़ आस्था का परिचय देती है। जीवन में संघर्षों, चिन्ताअों में जब अवसाद का दौर था और राह बोझिल-सी धुँधली होने लगी तभी योग एक नई रोशनी लेकर आया। सुजैन जी के अनुसार सिर्फ चंद दिनों पहले ही तो मेरी बहन ने जिंदगी खुशी से जीने की बात कही थी…! पर माँ को टर्मिनल ब्रेस्ट कैंसर होने की खबर ने हम सभी को बुरी तरह से अंदर तक हिला दिया था। हम दोनों बहनें माँ के साथ ही अपना सारा समय बिताने लगेे। मगर होनी को किसने रोका है…माँ हम सभी से अब सदा के लिए दूर चली गई थी…!!! अब मेरे मन में जिंदगी, सच्ची खुशी, जीवन का उद्देश्य,प्रेम, शांति एवं सुकून से संबंधित कई अनसुलझे प्रश्न आने लगे। इन्हीं प्रश्नों के जवाब जानने मैं भारत आई। लगभग 22 घंटों की यात्रा….यहाँ पहुँचने पर मेरी मुलाकात सबसे पहले एक योग गुरू से हुई। मुझे अपने सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर मिला….कि आपकी सारी समस्यायें आप खुद ही हल कर सकते हैं , कोई अौर नहीं। बस मार्गदर्शन सही होना चाहिए। मेरी दूसरी मुलाकात एक ऎसे बच्चे से हुई जिसके पास गायें थीं। उन गायों को देखकर ऎसा लग रहा था मानों सभी साथ में स्वीमिंग कर रहे हों!!! बच्चे के साथ मेरी खूब पटी। हमने साथ में बहुत जोक्स मारे। करीब ही एक मंदिर में मैंने कुछ लोगों से आध्यात्म पर बातें की। अपनी आँखों को कुछ समय बंद कर ध्यान करते हुए ऐसा लगा जैसे मै अँधेरेपन को चीरते हुए किसी तेज चमकते हुए प्रकाशपुंज में पहुँच गई हूँ। मन बिल्कुल शांत-सा….कहीं कोई कोलाहल नहीं…एक ऎसी वास्तविकता जिसका आधार ही लोगों को आपस में जोड़ना है। ऎसा तभी संभव है जब हम सभी अपने-अपने ऎंकर अर्थात् अपने गुरू का चुनाव आज ही कर लें ताकि सही मार्गदर्शन हो सके। सधन्यवाद आप सभी काे! ॐ गुरूवे नम: ॥🙏

अलानिस मोरिसेते ने अमेरिका के प्रसिद्ध ओपरा विनफ्रे शो के साथ हुए एक खास ऎपिसोड के साक्षात्कार में 1997 की अपनी भारत यात्रा को ‘दिव्य’ बताया है। अपनी ‘आनंदपूर्ण एक माह’ की भारत-यात्रा को मोरिसेते ने प्रकृति और हिमालय की गोद में बखूबी अनुभव किया है। अपने अन्दर हुए इस ‘आध्यात्मिक जागरण’ से जागृत होना , अपने ‘स्वयं की खोज’ से परिचय होना, बाहरी शोर-शराबे से दूर योग एवं ध्यान ने उनके चित्त को अलौकिक शांति प्रदान की है। हर थोडी़- थोड़ी दूर पर भारत के बदलते परिदृश्य हृदय एवं मन को जोश और ऊर्जावान् जिंदगी जीने का गुर सिखा जाते हैं। पूर्णतः सफल एवं सार्थक जीने और मानसिक उधेड़बुन से मुक्ति योग एवं आध्यात्मिक गुरूआें के देश अर्थात् विश्वगुरू भारत में ही संभव है….अतुलनीय भारत!

मिलिये बहन सुजैन ब्रांट जी से,एक फिल्ममेकर, पत्रकारिता से लेकर एक योग शिक्षिका तक का सफर

दलित राजनीति की चुनौती, सिर्फ समस्या ही समस्या, समधान पर चर्चा नहीं

भारत की जनसँख्या का वह भाग जो अपनी गिनती Scheduled Caste सूची (मैं दलित और शूद्र के विवाद में नहीं पड़ना चाहता) में करता है या अपने आप को इस सूची में पाता है, वह कैसे 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के 68 वर्ष बाद भी अपने आप को शोषित पाता है ?

विश्व के शायद ही किसी अन्य देश में इतना सक्षम और सशक्त positive discrimination या सकारात्मक भेदभाव होता हो. इसके बावजूद, अगर इस वर्ग के कुछ नेता यह महसूस करते है कि इस वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है, तो उन्हें यह बतलाना चाहिए कि उस अन्याय को कैसे समाप्त किया जा सकता है.

जबकि इन 68 वर्षो में से लगभग 58 वर्ष उन पार्टियों ने भारत में शासन किया जो अपने आप को तथाकथित रूप से Scheduled Caste वर्ग का हितैषी मानते है और उनके वोट पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे?
चूंकि संविधान लागू होने के समय इस वर्ग की जनसँख्या 15 प्रतिशत थी (लन 2011 की जनगणना के हिसाब से 16.6 प्रतिशत), संविधान में इस वर्ग को शिक्षा, नौकरी, चुनाव में 15 प्रतिशत आरक्षण दिया गया.
इसके अलावा, भारतीय संविधान ने ‘अस्पृश्यता’ को समाप्त कर दिया है.

अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में इस वर्ग के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. विश्व के शायद ही किसी अन्य देश में इतना सक्षम और सशक्त positive discrimination या सकारात्मक भेदभाव होता हो. इसके बावजूद, अगर इस वर्ग के कुछ नेता यह महसूस करते है कि इस वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है, तो उन्हें यह बतलाना चाहिए कि उस अन्याय को कैसे समाप्त किया जा सकता है.


इस वर्ग के नेता कुछ मार-पीट और अत्याचार का उदहारण देंगे. ऐसी मार-पीट और अत्याचार दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन क्या क्या यह केवल इसी वर्ग को झेलनी पड़ती है? क्या समाज के अन्य वर्ग को कोई प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ती है?
और उन अपराधों के लिए कौन जिम्मेवार है जब Scheduled Caste और पिछड़े वर्ग के दबंग लोग Scheduled Caste वर्ग के निर्धन लोगो पे अत्याचार करते है? जैसा कि अभी बागपत में Scheduled Caste वर्ग के लोगो ने Scheduled Caste महिला के साथ बलात्कार किया क्योकि उस महिला का Scheduled Caste पुत्र पहले वाले Scheduled Caste वर्ग की लड़की को तथाकथित रूप से भगा ले गया था?

ऐसा कहा जाता है कि Scheduled Caste के पास खेती की जमीन नहीं है. अतः वे खेती पे गुजारा नहीं कर सकते. लेकिन उन के पास अपनी जनसँख्या के प्रतिशत के अनुरूप शिक्षा और नौकरी का आश्वासन तो है.


ऐसा कहा जाता है कि Scheduled Caste के पास खेती की जमीन नहीं है. अतः वे खेती पे गुजारा नहीं कर सकते. लेकिन उन के पास अपनी जनसँख्या के प्रतिशत के अनुरूप शिक्षा और नौकरी का आश्वासन तो है.
इसके विपरीत, गुर्जर, जाट, पटेल के पास भूमि और खेती तो है, लेकिन उस कृषि से ना तो लाभ का, ना ही शिक्षा और ना ही नौकरी का आश्वासन है.
कही ऐसा तो नहीं है क़ि Scheduled Caste के अभिजात लोगो ने ही इस वर्ग के गरीब लोगो के अधिकारों पे कब्ज़ा कर लिया और उन गरीबो को अन्याय और लॉलीपॉप के नाम पे बहलाते और भड़काते रहते है, जिससे उनकी धूर्तता सामने ना आये ?

अमित सिंघल

न्यूयॉर्क

 

क्या उपभोक्ता की कोई वैल्यू नहीं है ?

मेरे प्रश्न – हम भारतीय कम्पटीशन से इतना डरते क्यों है? – पे कई कमेंट आये. इन विचारो का मैं स्वागत करता हूँ. सार्थक विचार-विमर्श से ही हम अपना मत बना सकते है कि राष्ट्र को किस दिशा में प्रगति करनी चाहिए.
विमर्श में व्यक्त विचारो से मेरी असहमति के कारण एक कमेंट में मुझसे पूँछा गया कि मैं किस उद्यम से हूँ. मेरे जवाब कि – “किसी भी उद्योग से नहीं. सिर्फ एक उपभोक्ता हूँ” – पे उन सज्जन ने एक व्यंगात्मक हुंकार भरी जिसका अनकहा सारांश यह था कि “हुर्रे इसीलिए आपको उद्योगों या व्यवसाय के बारे में कुछ भी नहीं पता.”
सहमत. मुझे उद्योगों या व्यवसाय के बारे में कुछ भी नहीं पता. सिर्फ कागजी ज्ञान है.
लेकिन मैंने यह भी लिखा था कि मैं एक उपभोक्ता हूँ. उस बात को वह सज्जन ही नहीं, बल्कि सभी मित्र जो यह मानते है कि सिंगल ब्रांड रिटेल में 100% FDI से भारतीय व्यापारियों को नुक्सान होगा, उन सब ने मेरे एक उपभोक्ता के आस्तित्व को नज़रंदाज़ कर दिया.
जैसे ग्राहक की कोई वैल्यू ही नहीं है.
इसी बिंदु पे वे सभी व्यवसायी FDI से लगने वाले या ऑनलाइन विक्रेता के लिए क्रिकेट की भाषा में विकेट छोड़कर बैटिंग शुरू कर देते है.
ऐसा नहीं है कि भारतीय दुकानों में ग्राहक सेवा में कमी है. दुकान में अगर कस्टमर घुस जाए, तो सेल्समैन कुछ ना कुछ बेच ही देता है. लेकिन मैं बात कर रहा हूँ कि आज के उपभोक्ता को क्या चाहिए और भविष्य में वह क्या और कैसे खरीदेगा?
यह एक ग्लोबल ट्रेंड है कि सभी देशो में ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ रही है. लेकिन भारत में उद्यमी उस पे रोक लगाना चाहेंगे या फिर चाहेंगे कि उन पे टैक्स बढ़ा दिया जाए. चलिए, आप टैक्स बढ़वा दीजिये. क्या तब भी आपको विश्वास है कि लोग ऑनलाइन शॉपिंग बंद कर देंगे? जिस तरह से ट्रांसपोर्ट और लोजिस्टिक्स (कर्मचारियों, सेवाओं, भण्डारण और बिक्री का जटिल मैनेजमेंट) के दाम गिर रहे है, क्या उससे कीमते नहीं गिरेंगी? जिस तरह से पति-पत्नी दोनों कार्य कर रहे है, आम मध्यम वर्ग के पास शॉपिंग के लिए समय नहीं है, क्या आपको लगता है कि उपभोक्ता ऑनलाइन शॉपिंग बंद या कम कर देगा?
क्या लोग एक दूसरे के लिए प्रोडक्ट ऑनलाइन खरीदकर उपहार के रूप में नहीं भेजते है? क्या व्यस्त महिला को सेल फ़ोन, कपड़े, किताबे, बर्तन इत्यादि ऑनलाइन खरीदने में सहूलियत नहीं है? क्यों एक परिवार आपकी दुकान में आएगा, जब उसे कार पार्क करने के लिए प्रतीक्षा करनी होगी, हो सकता है कि पार्किंग चार्ज देना पड़े, गन्दगी के बीच में से आपकी दूकान तक पहुंचना पड़े.
फिर, आप स्वयं उस ऑनलाइन मार्केट को एक विक्रेता के रूप में क्यों नहीं ज्वाइन करने का प्रयास करते? आप नहीं करेंगे, क्योकि GST फाइल करने के लिए भी आप तैयार नहीं है.
कुछ उदहारण देता हूँ. इवान स्पीगेल ने विश्वविद्यालय में पढ़ते समय यह नोट किया कि अगर बातचीत करते समय आपके कहे का कोई रिकॉर्ड नहीं रहता. दूसरा यह कि किशोर एवं किशोरिया कुछ ही घंटे में कई सौ टेक्स्ट मैसेज भेज देते थे, फिर उसे डिलीट करने में समय लगते थे. उसने सोचा कि क्यों न एक मैसेज का ऐप बनाया जाए जिसमे मैसेज पढ़ने के 10 सेकंड या उससे कम समय में स्वतः डिलीट हो जाए और उस एक विचार से स्नैपचैट कंपनी बना ली जो आज एक लाख करोड़ रुपये से अधिक कीमत की है.
जब मेरी पत्नी ने देखा कि हमारा किशोर पुत्र टेक्स्ट का जवाब नहीं देता या देर से देता है, और वह स्नैपचैट का प्रयोग कर रहा है तो उसने अपना भी स्नैपचैट का अकाउंट खोल लिया और दोनों की उसपे “चैट” होती है (पुत्र एक अलग शहर में पढ़ रहा है).
एप्पल के चेयरमैन स्टीव जॉब्स प्रथम iPhone ले लांच होने के कुछ दिन पहले ऑफिस में आये और iPhone को सबके सामने जमीन पे फेकते हुए बोले कि यह फोन वह बाजार में नहीं उतार सकते क्योकि आम उपभोक्ता उसे जेब में रखेगा और जेब में रखी चाबी और सिक्कों के कारण उसकी स्क्रीन पर खरोच आ जाएगी. ऐसे उत्पाद को कौन ग्राहक खरीदना चाहेगा. तब उनकी कंपनी के लोगों को पता चला कि स्टीव उस फोन को अपनी जेब में रखकर घूमते थे. क्योंकि उनका अनुमान था कि आम उपभोक्ता कुछ समय तो iPhone की सुंदरता से प्रभावित रहेगा, फिर उसे एक आम उत्पाद के रुप में अपनी जेब में रख कर घूमेगा.
रातों-रात उस कंपनी ने एक ऐसी स्क्रीन को ढूंढ निकाला जिस पर खरोच आसानी से नहीं आएगी और उसे 72 घंटे के अंदर चीन की फैक्ट्री में सारे iPhone पर बदलवाने का आदेश दे दिया.
क्या वास्तव में आपको लगता है कि अगर सिंगल ब्रांड रिटेल में 100% FDI ना आये तो आपका बिज़नेस जमा रहेगा? क्या आज कि कोई नवयुवती किसी ऐसे आईडिया को लेकर नहीं आ सकती, जिसे हमने और आपने ना सोचा हो और वह कुछ ही दिनों में आपके बिज़नेस को उलट-पलट दे?
चलिए FDI आप ने कांग्रेस को जितवाकर रुकवा दी, भले ही उसकी कीमत कही और आपके बच्चो को चुकानी पड़े. लेकिन क्या आप थ्री-डी प्रिंटर को भी रोक देंगे जो अगले पांच वर्षो में कॉमन हो जायेगा और जो कई वस्तुए – जैसे कि कार कि पुर्जे, बर्तन, खिलौने इत्यादि आपके घर में प्रिंट कर देगा या बना देगा?
क्या आपका “गूढ़” अनुभव आपके उद्यम को अनाड़ियों – कल के छोकरे-छोकरियों – द्वारा लाये जा रही डिजिटल युग की आंधी से बचा देगा  ?

अमित  सिंघल

न्यूय़ॉर्क

 

वामपंथी इतिहासकारों की नादानी… सोमरस को बता दिया शराब

प्राच्य संस्कृतियों के अधिकतर आलोचकों की मान्यता रही है कि वैदिक ऋषि भी शराब पीते थे जिसे सोमरस कहते थे। बच्चन के बाउजी बड़के बच्चन साहब ने तो पूरी कविता ही झोंक रखी है इसी सोच के आस पास।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती ‘साकीबाला’,
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।

सोमरस’शराब’ नहीं है वह ऋगवेद की इस ऋचा से स्पष्ट हो जाता है –
ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है कि
।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
इसका मतलब है कि सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

बल्कि सोमरस कोई मादक पदार्थ न होकर कोई पवित्र रस या औषधि ही होनी चाहिए।

स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है-

जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं | वे पापकर्मों से शुद्ध होकर, इन्द्र के पवित्र स्वर्गिक धाम में जन्म लेते हैं, जहाँ वे देवताओं का सा आनन्द भोगते हैं |

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्र्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ||

कुछ का विचार विचार है कि सोम वह पादप है जो अफगानिस्तान की पहाड़ियों में पैदा होता है ऐसा इनका दावा है उसके लिए ये ऋग्वेद 10.34.1 का मन्त्र “सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः” उद्धृत करते हैं। मौजवत पर्वत को आजके हिन्दुकुश अर्थात अफगानिस्तान से निरर्थक ही जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। निरुक्त में “मूजवान पर्वतः” पाठ है मगर वेद का मौजवत और निरुक्त का मूजवान एक ही है, इसमें संदेह होता है, क्योंकि सुश्रुत में “मुञ्जवान” सोम का पर्याय लिखा है अतः मौजवत, मूजवान और मुञ्जवान पृथक पृथक हैं ज्ञात होता है।

कुछ विद्वान सोमरस को मत्स्यपुराण के इस श्लोक से भी जोड़ते हैं, हालांकि यहां सोम का अर्थ चन्द्रमा से है। जहांआठ वसुओं में सोम की गणना इस प्रकार है-

आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल: । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता: ॥

कुछेक विद्वान सोमरस को भांग बताते हैं लेकिन सोमरस के दही में मिलाए जाने का वर्णन है और भांग कभी भी दही में नहीं मिलाते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में लिखा गया है कि यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त होता है.
(ऋग्वेद-1/5/5) हे वायुदेव! यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है. आइए और इसका पान कीजिए. (ऋग्वेद-1/23/1)
।।शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदुनिम्नं न रीयते।।
(ऋग्वेद-1/30/2) अर्थात नीचे की ओर बहते हुए जल के समान प्रवाहित होते सैकड़ों घड़े सोमरस में मिले हुए हजारों घड़े दुग्ध मिल करके इंद्रदेव को प्राप्त हों।

सोमरस बनाने का बड़ा नाटकीय वर्णन अमीश त्रिपुठी ने अपने उपन्यास Immortals of Meluha में किया है

जबकि वेदों में इसका पूर्ण विवरण है-

।।उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि।। (ऋग्वेद सूक्त २८ श्लोक ९)

(यानी मूसल से कुचली हुई सोम को बर्तन से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और छानने के लिए पवित्र चरम पर रखें।)

।।औषधि: सोम: सुनोते: पदेनमभिशुण्वन्ति।- निरुक्त शास्त्र (११-२-२)

(यानी सोम एक औषधि है जिसको कूट-पीसकर इसका रस निकालते हैं. सोम को गाय के दूध में मिलाने पर ‘गवशिरम्’दही में ‘दध्यशिरम्’बनता है. शहद या घी के साथ भी मिश्रण किया जाता था. सोम रस बनाने की प्रक्रिया वैदिक यज्ञों में बड़े महत्व की है. इसकी तीन अवस्थाएं हैं- पेरना, छानना और मिलाना. कहा जाता है ऋषि-मुनि इन्हें अनुष्ठान में देवताओं को अर्पित करते थे और बाद में प्रसाद के रूप में खुद भी इसका सेवन करते थे.)

संजीवनी बूटी की तरह हैं इसके गुण

सोमरस एक ऐसा पेय है, जो संजीवनी की तरह काम करता है. यह शरीर को हमेशा जवान और ताकतवर बनाए रखता है.

(।।स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्, तीव्र: किलायं रसवां उतायम। उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रम, न कश्चन सहत आहवेषु।।- ऋग्वेद (६-४७-१))

यानी सोम बहुत स्वादिष्ट और मीठा पेय है. इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है. वह अपराजेय बन जाता है. शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है.

अलग है आध्यात्मिक अर्थ

यदि आध्यात्मिक नजरिए से यह माना जाता है कि सोम साधना की उच्च अवस्था में इंसान के शरीर में पैदा होने वाला रस है. इसके लिए कहा गया है.

(सोमं मन्यते पपिवान् यत् संविषन्त्योषधिम्। सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन।। (ऋग्वेद-१०-८५-३))

यानी बहुत से लोग मानते हैं कि मात्र औषधि रूप में जो लेते हैं, वही सोम है ऐसा नहीं है. एक सोमरस हमारे भीतर भी है, जो अमृतस्वरूप परम तत्व है जिसको खाया-पिया नहीं जाता केवल ज्ञानियों द्वारा ही पाया जा सकता है

वनस्पति शास्त्र और आयुर्वेद में एक लता का वर्णन है जिसे सोमवल्ली कहते हैं।

इसे महासोम,अंसुमान , रजत्प्रभा , कनियान , कनकप्रभा , प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान , चन्द्रमा ,,गायत्र ,पवत , जागत , साकर आदि नामो से भी जानते हैं।

इसका वैज्ञानिक नाम Sarcostemma acidum है, और यह Apocynaceae परिवार का सदस्य है जो सबट्रापिकल हिमालय में कठिनाई से मिल जाता है।

आयुर्वेदिक ग्रंथ इसके बारे में सूचना देते हैं-

पञ्चांगयुक्पञ्चदशच्छदाढ्या सर्पाकृतिः शोणितपर्वदेशा। सा सोमवल्ली रसबन्धकर्म करोति एकादिवसोपनीता ।। करोति सोमवृक्षोऽपि रसबन्धवधादिकम्। पूर्णिमादिवसानीतस्तयोर्वल्ली गुणाधिका ।। कृष्ण पक्षे प्रगलति दलं प्रत्यहं चैकमेकं शुक्लेऽप्येकं प्रभवति पुनर्लम्बमाना लताः स्युः । तस्याः कन्द: कलयतितरां पूर्णिमायां गृहीतो बद्ध्वा सूतं कनकसहितं देहलोहं विधत्ते ।। इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्धसूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते। (रसेंद्रचूड़ामणि 6।6-9) ‘जिसके पंद्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है, जहाँ से पत्ते निकलते हैं- वे गठिं जिसकी लाल होती है, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लायी हुई पञ्चांग- (मूल, डण्डी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को वद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाया हुआ पञ्चांग- (मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल-) से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बधिना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परंतु सोमवल्ली और सोमवृक्ष- इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुणों वाली है। इस सोमवल्ली का कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्ल पक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह यह लता बढ़ती रहती है। पूर्णिमा के दिन इस लता का कंद निकाला जाए तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्षवेधी हो जाता है अर्थात एक गुणा बद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त ही दुर्लभ है।

कम से कम आज के समय में सोमवल्ली किसी सोमलता से कम नहीं।

डा.मधुसूदन उपाध्याय

लखनऊ