भारत में आधार कार्ड को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। आधार को सरकारी सेवाओं से लिंक करने के प्रयास को निजी सुरक्षा के लिए खतरा माना. अगर आप सोशल और न्यूज़ मीडिया को देखे, तो अधिकतर लोग – लगभग सारे के सारे वामपंथी और एक्टिविस्ट – आधार के विरुद्ध है. वे अपने तर्कों के लिए प्राइवेसी और गरीबो को आधार से सम्बंधित तकनीकी परेशानी का हवाला देते है.
और इसी बिंदु पे वे अभिजात वर्ग की सत्ता पे पकड़ वाली थ्योरी को सत्य कर देते है कि अभिजात वर्ग ने जनता को बरगला कर स्वतंत्रता के बाद सत्ता पे कब्ज़ा किया हुआ था.
कैसे?
इस अभिजात वर्ग के सौ प्रतिशत सदस्य यूरोप और अमेरिका जाते है. इन सभी देशो के वीसा के लिए बायोमेट्रिक इनफार्मेशन ली जाती है. और तो और, कनाडा के वीसा के लिए आपको अपने भाई-बहनो का भी विवरण देना पड़ता है. वहां जाने के लिए इस अभिजात वर्ग को प्राइवेसी का खतरा दिखाई नहीं देता, लेकिन भारत में यह एक इशू बन जाता है.
यह दोगलापन नहीं तो और क्या है?
वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र में सभी देशो ने 17 सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) को अपनाया था, जिनके अमल से विश्व में गरीबी मिटाई जा सकती है, सभी को शिक्षित किया जा सकता है और स्त्री-पुरुष समानता प्राप्त किया जा सकेगा. इनमे से एक लक्ष्य शांतिपूर्ण और समरस समाज की स्थापना के बारे में है, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र कहता है कि सभी व्यक्तियों को कानूनी पहचान प्रदान करना होगा.
क्योकि बिना क़ानूनी पहचान के रामलाल को यह सिद्ध करना होगा कि वही रामलाल है. उस पहचान पत्र के लिए किसी सरपंच, बाबू या बैंक के समक्ष दीनभाव से गिड़गिड़ाना होगा.
आधार कार्ड ने रामलाल को यह शक्ति दी है, यह आत्मविश्वास दिया है कि उसका आस्तित्व सुरक्षित है, उसके अधिकार सुनिश्चित है, उसकी गरिमा अक्षुण्ण है.
अगर विश्वास नहीं है तो अपने गांव में किसी ताई से आधार कार्ड वापिस करने को बोलिये.
है  हिम्मत आपमें

अमित सिंघल

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