डॉ आंबेडकर और मनु स्मृति

साल 1927, अम्बेडकर साहब ने कुछ लोगों के साथ मिलकर मनुस्मृति जलाई।नब्बे साल बाद उदित राज भाजपा वाले को भी जरूरत पड़ रही है पुस्तकें जलाने की।

यूनानी नाटककार एशीलस ने सच ही कहा था कि ‘युद्ध का सबसे पहला शिकार सत्य ही बनता है।’ यह बात अंध-दुराग्रह वाले वैचारिक युद्धों पर भी लागू होती है। इनका भी सबसे पहला शिकार सत्य ही बनता है, धर्म ही बनता है। इसका शिकार बनना पड़ता है मानवीय उदारता, विनम्रता, व्यापकता और वैज्ञानिकता को।

हम विज्ञान युग की पीढ़ी हैं।ये किताबें जलाने जैसे मध्ययुगीन तरीके हमें शोभा नहीं देते. अतीत में पुस्तकालयों के ही दहन का काम नालंदा, अलेक्ज़ान्द्रिया और अल-हकम से लेकर कुस्तुनतुनिया तक में कुछ सिरफिरे लोगों ने किया था। हम ऐसा क्यों करें।दहन जो हुआ सो हुआ। अब हम थोड़ा रहन, सहन, शोधन, उन्नयन और प्रबोधन भी सीख लें।

मनु के प्रति बहुत गुस्सा है, ठीक है । हमने भावावेश में और सामाजिक-राजनीतिक संदेश देने के लिए उनके नाम से चलने वाली पुस्तक को एक बार चंदन की चिता पर रखकर जला भी डाला। चलो वह भी ठीक। लेकिन यह क्या कि हम कुत्सित दुष्प्रचार का घिनौना तेल डाल-डाल कर जब-तब उसे जलाते रहें। उस किताब पर जूती रख कर कहें कि हम नारीवादी हैं और सभ्य हैं। किसने रोका है, खराब बातों को निकाल बाहर कीजिए।चाहें तो अच्छी बातों को रख लीजिए, उन्हें जीवन में भी उतारिए। उसे और बेहतर बनाइये. चाहे जैसी भी हो, अपनी धरोहरों और अतीत की गलतियों से निपटने के लिए हम रीकंसीलिएशन, सत्यशोधन और सत्याग्रह का सहारा लेना भी सीखें।

गांधी और अंबेडकर दोनों ने ही एक से ज्यादा अवसरों पर इसे स्वीकारा था कि मनुस्मृति के नाम से प्रचलित मौजूदा किताब वास्तव में मनु के अलावा मुख्य रूप से किसी भृगु के विचारों से भरी पोथी थी, जिसमें बाद में भी कई लोगों ने जोड़-तोड़ की।

मनुस्मृति पर अपनी स्थिति और स्पष्ट करते हुए गांधीजी ने कहा था –

‘मैं मनुस्मृति को शास्त्रों का हिस्सा अवश्य मानता हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं मनुस्मृति के नाम से चल रही किसी पुस्तक में छपे हर एक श्लोक को अक्षरशः सत्य मानता हूं. छपी हुई किताब में इतने विरोधाभास भरे पड़े हैं कि यदि आप एक हिस्से को स्वीकार करें, तो आपको उन अन्य हिस्सों को अस्वीकार करना ही पड़ेगा जो उससे बिल्कुल भी मेल नहीं खाते… दरअसल आज किसी के भी पास मूल ग्रंथ की प्रति है ही नहीं.’

मनुस्मृति के नाम से प्रचलित इसकी मौजूदा प्रतियां भारुचि, मेधातिथि, गोविंदराज एवं कूल्लूक भट्ट इत्यादि द्वारा अलग-अलग समय पर (7वीं से 13वीं सदी के बीच) किए गए संकलनों और भाष्यों (कमेंटरी) पर आधारित हैं।

वैदिक शास्त्र संस्कृत में हैं और संस्कृत के सम्बन्ध में बाबा साहब अम्बेडकर अज्ञानी थे जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है देखें –

“यदि कहा जाये कि मैं संस्कृत का विद्वान नहीं तो मैं मानने को तैयार हूँ परन्तु संस्कृत का विद्वान न होने से मैं इस विषय पर लिख क्यों नहीं सकता ?
संस्कृत का बहुत थोड़ा अंश है जो अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध नहीं है। इसलिए संस्कृत न जानना मुझे इस विषय पर न लिखने का अनाधिकारी नहीं ठहरा सकता।
अंग्रेजी अनुवादों का पंद्रह साल अध्ययन करने के बाद यह अधिकार मुझे अवश्य प्राप्त है |”

(शूद्रों की खोज, प्राक्कथन प्र.2, समता प्रकाशन नागपुर)

भीमराव के इस कथन से यह तो स्पष्ट है कि वह संस्कृत भाषा में अज्ञानी थे तथा उनका वैदिक शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान अंग्रेजी अनुवादों पर आधारित था।

तो अब बाबा साहेब जी ने मनुस्मृति का जो अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा वो मैक्समूलर का अनुवाद किया हुआ था, मैक्समूलर को संस्कृत का अच्छा ज्ञान था।

दुर्भाग्य से बाबासाहेब ने जो मनुस्मृति पढ़ी वो वही थी मैक्समूलर की एडिट की हुई। अर्थात मनुस्मृति का विरोध बाबासाहेब ने जानबूझकर कर नही बल्कि अंग्रेजो की साजिश में फंसकर किया।

यहाँ मैं भाषाओँ के सम्बन्ध में एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि संस्कृत भाषा में 1 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द हैं जबकि अंग्रेजी भाषा में मात्र 171476 शब्द हैं।

अब बुद्धजीवी यह विचार करें कि क्या संस्कृत शास्त्रों का अंग्रेजी में अनुवाद संभव है?

अगर कोई अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के आधार पर वैदिक शास्त्रों का अर्थ करने की जिद कर बैठे तो वह अर्थ नहीं अनर्थ कहलायेगा। संस्कृत में अज्ञानी होने के बावजूद पूर्वाग्रह से ग्रसित भीमराव मनुस्मृति के श्लोकों का अनर्थ कर बैठे और अपनी इसी अज्ञानता के चलते मनुस्मृति को जलाने की मूर्खता कर बैठे। भीमराव का मनुविरोध केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ था जिसका कोई आधार नहीं था!
उन पर तो बस मनुविरोध का भूत सवार था जो कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, देखें – “मुझ पर मनु का भूत सवार है और मुझ में इतनी शक्ति नहीं है कि मैं उसे उतार सकूं |” ( अम्बेडकर वांग्मय, खण्ड 1, प्र. 29 )

भीमराव के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि भीमराव पर भूत सवार था और उनका मनुविरोध निराधार था!

बाबा साहब हिन्दू धर्म शास्त्रों के सम्बन्ध में अज्ञानी थे इसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है!
देखें – “हिन्दू धर्म शास्त्र का मैं अधिकारी ज्ञाता नहीं” ( जातिभेद का उच्छेद, प्र. 101, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )

जब महात्मा गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर के मनुस्मृति अनुवाद पर आपत्ति जतायी तो बाबा साहब ने यह स्वयं स्वीकार किया कि मनुस्मृति के विषय पर पूर्ण अधिकार नहीं है, देखें –
“गाँधी जी की पहली आपत्ति यह है कि मैंने जो श्लोक चुने हैं वे अप्रमाणिक हैं, मैं यह मानता हूँ कि मेरा इस विषय पर पूर्ण अधिकार नहीं है” ( जातिभेद का उच्छेद, प्र. १ 120, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )!

पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता के कारण बाबा साहब ने मनु के अंधविरोध को ही अपना लक्ष्य बना लिया था और इसी अंधविरोध के कारण बाबा साहब ने स्वयं ही अपनी विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगा लिया!

जिसका एक उदहारण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

बाबा साहब ने जर्मन के प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रीडरिच नीत्से की तुलना महर्षि मनु से करते हुए कहा है कि “नीत्से की तुलना में मनु के महामानव का दर्शन अधिक नीच तथा भ्रष्ट है” ( अम्बेडकर वांग्मय, खण्ड 6, प्र. 101)

जिस नीत्से की तुलना में बाबा साहब मनु के दर्शन को नीच तथा भ्रष्ट बता रहे हैं उसी नीत्से ने मनुस्मृति के सम्बन्ध में कहा है – “CLOSE THE BIBLE AND OPEN THE CODE OF MANU” अर्थात बाइबिल को पढ़ना बंद करो और मनु के संविधान को पढ़ो ( The will to power, vol. 1, book 2nd, p. 126 )

“How wretched is the new testamant compared to manu. How faul it small !” अर्थात मनुस्मृति बाइबिल से बहुत उत्तम ग्रन्थ है | बाइबिल से तो अश्लीलता और बुराइयों की बदबू आती है ( wiyond nihilism nietzsche, without marks P41 )

नीत्से के इन कथनों से बुद्धजीवी यह अनुमान लगा सकते हैं कि बाबा साहब का मनुविरोध केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ था जो कि पूर्णतयः निराधार था। बाबा साहब ने अपने अंधविरोध के कारण मनुस्मृति जलाकर अपनी अपनी विद्वता पर स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगा लिया।

भला हो बाबा साहब आपका जो आपने अपने अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर सिक्खों की गुरुवाणी का अनुवाद नहीं किया अन्यथा आप उसे भी जला देते क्योंकि गुरुगोविन्द सिंह के दशम ग्रन्थ में एक पूरा काव्य सन्दर्भ मनु के विषय पर वर्णित है।

यहाँ कुछ विश्वप्रसिद्ध देशी विदेशी विद्वानों की सूची प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की महानता को स्वीकार किया है –
1.गौतम बुद्ध
2.बौद्ध महाकवि अश्वघोष
3.विश्वरूप
4.शबरस्वामी
5.विज्ञानेश्वर
6.आचार्य चाणक्य
7.राजा धारसेन ( 571 ई. )
8.शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह
9.गुरु गोविन्द सिंह
10.ऋषि दयानंद
11.स्वामी विवेकानंद
12.श्री अरविन्द
13.डॉ. राधाकृष्णन
14.जवाहर लाल नेहरु
15.मोहन दास करमचंद गाँधी
16.जस्टिस डी. एन. मुल्ला
17.जस्टिस एन. राघवाचार्य
18.पाश्चात्य इतिहासकार ए. बी. कीथ
19.जर्मन दार्शनिक नीत्से
20.भारत रत्न श्री पी. वी. काणे
21.डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकर
22.पाश्चात्य लेखक पी. थॉमस
23.रुसी विचारक पी. डी. औस्मेंसकी
24.ब्रिटिश लेखक डॉ. जी. एच. मीज
25.मैडम एनी बेसेंट
26.मैडम एच. पी. ब्लेवात्सकी
27.पुरातत्ववेत्ता गार्डन चाइल्ड
28.सर विलियम जोन्स
29.जी. सी. होग्टन
30.फ्रेंच विद्वान पार. ए. लोअसल्युर

ऐसे अनेक विश्वप्रसिद्ध विद्वानों ने मनुस्मृति की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है तथा मनुस्मृति को जलाने की बजाय उस पर शोध किया। इस सारी दुनिया में केवल एक ही ऐसा अद्भुत विद्वान था जिसने मनुस्मृति पर शोध करने की बजाय उसे जलाने में दिलचस्पी दिखाई और उस अद्भुत विद्वान का नाम था-डॉ. भीमराव अम्बेडकर।

मधुसूदन

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