एक समाचार जो भारत में छपा नहीं

पिछले वर्ष 15 मई को हिंदुस्तान टाइम्स ने कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की वेबसाइट का जानबूझकर – जानबूझकर – गलत विश्लेषण करते हुए लिखा कि भारत पत्रकारों के लिए तीसरा सबसे खतरनाक देश है, जबकि कमेटी की वार्षिक रिपोर्ट दिसंबर में जारी होती है.
इस वर्ष का डाटा कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ने 21 दिसंबर को पब्लिश कर दिया है. फिर भी किसी भारतीय समाचारपत्र में इसकी खोज खबर नहीं ली गई. ऐसा क्यों?
क्योंकि कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के अनुसार इस वर्ष भारत में तीन पत्रकारों की या तो हत्या हुई या एक खतरनाक मिशन पर कार्य करते हुए उनकी मृत्यु हो गई. इनमें से एक पत्रकार सुदीप दत्त भौमिक की त्रिपुरा की पुलिस ने नवंबर में हत्या की, जबकि दूसरे पत्रकार शांतनु भौमिक त्रिपुरा को पीपुल्स फ्रंट और सत्तारूढ़ गणमुक्ति परिषद पार्टी के सदस्यों के बीच झड़पों को कवर करते समय भीड़ ने मार दिया.
तीसरी पत्रकार गौरी लंकेश थी, जिनकी हत्या उनके घर के बाहर कर दी गई थी. कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के अनुसार लंकेश, राज्य सरकार की तरफ से माओवादी विद्रोहियों को राज्य पुलिस के सामने सरेंडर कराने का प्रयास करवा रही थी. उनके भाई इंद्रजीत लंकेश के अनुसार गौरी लंकेश को माओवादी विद्रोहियों की तरफ से बहुत सारी धमकी भरी मेल आती थी और उन्होंने मांग की कि सीबीआई को यह जांच करनी चाहिए कि उनकी हत्या हिंदू उग्रवादियो ने की या माओवादी गैंग ने.
यही पर राज छुपा है. कैसे “वे” त्रिपुरा की सरकार के विरुद्ध लिख देंगे?
अगर लंकेश के बारे में ही लिखेंगे, तो मेरे जैसे लोग कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की वेबसाइट का हवाला देकर लंकेश के भाई का बयान और त्रिपुरा में हुई दो हत्याओं की याद दिला देंगे.
फिर कहाँ मुंह छिपाएंगे?

अमित सिंघल

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