गांव जवार के बरम बाबाओं में छिपा है असल भारत

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गाँवों में ‘बरम बाबा’ का स्थान पाया जाता है – ब्राह्मण अनुशासन का गँवई रूप। नीम,पीपल, बरगद, पाकड़ आदि के किसी वृक्ष के नीचे सादा सा चबूतरा बना दिया जाता है।

जहां मन्नत स्वरूप जेवनार चढ़ाया जाता है। गोंइठी की आग पर गाय के दूध में चावल डाल छोड़ दिया जाता है। दूध उफन कर बाहर गिरता है, तब प्रसाद स्वरूप इस फीकी खीर को उतार कर बाँट दिया जाता है।

इसे ‘जेवनार’ क्यों कहते हैं? इस शब्द की व्युत्पत्ति क्या है?

सोने की थाली में जेवना परोसे ……’

में जेवना का अर्थ व्यंजन हो सकता है. जेवना का आहार जेवनार (विशिष्ट गण भोज) के अर्थ में प्रयुक्त लगता है.
मेरी समझ में इसके मूल में जिम्‌ धातु है जिसका अर्थ होता है खाना। पुरानी हिन्दी में इस से निकला शब्द जीमना चलता था.. मराठी में भी खाने को जेवण कहते हैं।
जब बड़ी पंगत होती है बहुत से लोगों को एक साथ बैठा कर भोजन कराया जाता है उसे ही जेवनार कहते हैं। हि्न्दी में इस का रुप ज्यौनार है।

छत्तीसगढ़ में जेवन, सामान्‍यतः रात के भोजन के लिए प्रयुक्‍त होता है और बर्तन को जेवनहा भी कहा जाता है।

मालवी, राजस्थानी बोलियों में जीमना शब्द भी खाने अथवा भोजन के अर्थ में इस्तेमाल होता है। जीमना शब्द बना है संस्कृत धातु जम् से जिसका मतलब होता है आहार। जम् से ही बना है जमनम् जिसमें भोजन, आहार आदि का ही भाव है। इसका एक रूप जेमनम् भी है। मराठी में इसका रूप हो जाता है जेवणं। हिन्दी में इसका क्रिया रूप बनता है जीमना और राजस्थानी में जीमणा। पूर्वी हिन्दी में इसे ज्योनार या जेवनार कहा जाता है। जीमण, ज्योनार शब्दों का लोकगीतों में बड़ा मधुर प्रयोग होता आया है। शादी में विवाह-भोज को ज्योनार कहा जाता है। यह एक रस्म है।

संस्कृत में पुत्री के लिए जामा शब्द है। इमें पुत्रवधु का भाव भी निहित है। जामिः का अर्थ भी स्त्रीवाची है जिसमें बहन, पुत्री, पुत्रवधु, निकट संबंधी स्त्री, गुणवती स्त्री आदि। ये दोनो शब्द बने हैं जम् धातु से जिसका अर्थ होता है भोजन। जीमण, ज्योनार जैसे शब्द इसी जम् धातु से बने हैं। जम् में ज वर्ण में निहित उत्पन्न करना जैसा भाव शामिल है। जम् अर्थात आहार ही जीवन का मुख्य आधार है।

हमारे समाज में पारंपरिक तौर पर भोजन निर्माण का काम स्त्री ही करती आई है इसीलिए जम् से बने जामिः अथवा जामा में भोजन निर्माण करनेवाली स्त्री का भाव भी निहित है। इसी क्रम में आता है जाया शब्द जिसका अर्थ है पत्नी। दम्पती की तर्ज पर पति-पत्नी के लिए जायापति या जम्पती शब्द भी है।

परन्तु हमारे तरफ ज्यौनार चढ़ाने और बनाने का काम पुरूष ही करते आए हैं। वह कोई बाबा का प्रिय सेवइक(पंचरा वाली भाषा में सेवक सेवइक हो जाता है #पंचरा क्या होता है यह जानने के लिए आपको मेरे जैसे ही किसी सेवइक के गले से सुनना पड़ेगा) होता है या फिर , साधारणतया कुल का वयोवृद्ध व्यक्ति यह कर्तव्य अधिकार के साथ निभाता है।

साल भर में बाबा को पांच जेवनार चढ़ने चाहिए-

१.शारदीय नवरात्रि की सप्तमी को
२.श्रावण शुक्ला सप्तमी को
३.होली को
४-दीपावली के बाद गोधन को
५-नागपंचमी के दिन खलिहान में या घर पर

उपले (गोइठा) की आग में गाय के दूध और चावल से मिट्टी के बर्तन में पकाया जाने वाला ज्यौनार इन प्राकृतिक शक्तियों को बिना किसी अप्राकृतिक या कृत्रिम वस्तु का प्रयोग किये केले के पत्ते या कटहल के पत्ते पर रखकर अर्पित किया जाता है।

पूजा या उपासना का कितना अच्छा रूप है न ,बिना किसी शोर शराबे के, बिना किसी ताम झाम के, बिना किसी बड़े खर्च-वर्च के, बिना किसी की भावनाओं को आहत किये या बिना किसी को उत्तेजित किये जाने कबसे ये ज्यौनार चढ़ाए जाते रहे हैं. अपनी स्थानीयता और देसजता को बचाए रखते हुए.
इसके स्वाद का भी कोई विकल्प नहीं है कितना भी सूखा मेवा और रबड़ी या मिल्कमेड या कस्टर्ड पाउडर डालकर खीर बना लीजिए, ज्योनार के स्वाद से उसकी तुलना नहीं हो पाएगी.

भौतिकता की आंधी हमारे ज्योनार को भी खत्म करती जा रही है. आज की पिज्जा, बर्गर और मैगी वाली पीढ़ी इस देसजता को अपने तथाकथित स्मार्टनेस और स्टेटस के विरुद्ध पाती है. ज्यौनार का खत्म होना प्रकृति के प्रति स्नेह के साथ स्थानीयता का खत्म होना भी है।

देखिएगा कहीं ऐसा न हो कि ग्लोबल विलेज के चक्कर में आपका गांव विलेज में बिला जाए।

डा.मधुसूदन उपाध्याय

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