छठ पूजा, नारी प्रतिष्ठा का स्थापना पर्व

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इक्कीसवीं शताब्दी में नालेज इज पावर है… है ना…..

और छठ आर्यावर्त के उस इलाके का उत्सव है जहाँ पंडित जी के पतरा से ज्यादा ज्ञान पण्डिताइन के अंचरा में रहता है। भारत विरोधियों को आमंत्रित करता हूँ कि बिहार और पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाए जाने वाले दुनिया के सबसे ‘इको फ्रेंडली’ ओर अपने मूल में संभवतः सबसे ‘फेमिनिस्ट’ त्योहार छठ महापर्व का लैंगिक विमर्श या जातीय विमर्श के लिहाज से अध्ययन करें।

आज जब बाजार ने ‘फेमिनिस्ट डिस्कोर्स,   देहमुक्ति इत्यादि’ को ही बाजारवाद का हथियार बना दिया है, छठ अपने मूल स्वभाव में सह-अस्तित्व और धारणीय विकास के साथ साथ स्त्री सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उत्सव प्रमाणित हुई है।

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘परती परिकथा’ का एक पात्र स्त्री लोकगीतों के माध्यम से लोकमन और लोकजीवन को समझने की कोशिश करता है। अब इसी प्रकाश में देखिए ना छठ पर्व के इन अमर-गीतों को ….

“केरवा जे फरेला घवद से ओहपे सुग्गा मेड़राय…”…

एक ही गीत में तुम्हारे सारे सैद्धांतिक ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘बायोडायवर्सिटी प्रिजर्वेशन’ सब हवा हो जाते हैं।
और ये “कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए…..”..बहंगी जो लचक रही है न..ये बिहार और पूर्वांचल के गरीब किसान की श्रद्धा और समृद्धि का बोझ है।

छठ पर्व में सुरसरि गंगा भी अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित हैं……’मइया ए गंगा मइया,मांगिलां हम वरदान…’

कैसे दो विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधा जाता है…. यहाँ देखिए..
“ससुरा में मांगिले अन्न धन लक्ष्मी, नैहर सहोदर जेठ भाय हे छठी मइया….”

जिन्हें लगता है हिन्दुस्तानी औरत बस आंगन की तुलसी है…उनके लिए..
“छठी मईया सुतेली ओसारवा लट देली छितराय…”
छठ सबसे बड़ा स्वच्छ भारत अभियान भी है….

“कोपि-कोपि बोलेली छठी माई सूनि ए सेवका लोगवा हमरी घाटे दुबिया उपज गईले मकरी बसेरा लेले..”
कुछ सनातन धर्मी भी कहते हैं कि छठ सिर्फ प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना का त्योहार है ……सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” जिसका अर्थ है सूर्य जगत की आत्मा है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा व रोशनी ही जगत में ऊर्जा व चेतना भरती है।
सूर्य – ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)
देवी भागवत पढ़ लें एक बार वहाँ षष्ठी देवी का पूरा चरित्र है।

खैर, छठ के अनूठे स्वरूप को बर्बाद करने की कोशिश करने वाले तत्व भी पूरी मुस्तैदी से आ डंटे हैं। कल ही गांव में गाना सुना-“कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी करे चोयं चोंय चोंय”।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी तिथि को पारंपरिक रू प से विवस्वत् षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इसमें प्रधान रूप से संज्ञा सहित सूर्य की पूजा है।

पौराणिक परंपरा में संज्ञा को सूर्य की पत्नी कहा गया है। इस पर्व की परंपरा कम से कम 1000 साल प्राचीन है क्योंकि गहड़वाल राजा गोविंदचंद्र (12वीं शती का पूर्वाद्ध) के सभा पंडित लक्ष्मीधर कृत्यकल्पतरु में इस दिन सूर्य की पूजा का विधान किया है।

मिथिला के धर्मशास्त्री रुद्रधर (15वी शती) के अनुसार इस पर्व की कथा स्कंदपुराण से ली गई है। इस कथा में दुख एवं रोग नाश के लिए सूर्य का व्रत करने का उल्लेख किया गया है- भास्करस्य व्रतं त्वेकं यूयं कुरुत सत्तमा:। सर्वेषां दु:खनाशो हि भवेत्तस्य प्रसादत:।

षष्ठी तिथि को निराहार रहकर संध्या में नदी के तट पर जाकर धूप, दीप, घी, में पकाये हुए पकवान आदि से भगवान भास्कर की आराधना कर उन्हें अ‌र्घ्य दें। यहां अ‌र्घ्य-मंत्र इस प्रकार कहे गए हैं-

“नमोऽस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोऽस्तु वैश्वानर जातवेदसे। त्वमेव चाघर्य प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।। नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे। दत्तमघ्र्य मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकर।। एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। गृहाणाघ्र्य मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।”

शिव की शक्ति से उत्पन्न कार्तिकेय को छह कृतिकाओं ने दूध पिलाकर पाला था। अत: कार्तिकेय की छह माताएं मानी जाती हैं। और उन्हें षाण्मातर् भी कहा जाता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि कृतिका नक्षत्र छह ताराओं का समूह भी है तथा स्कंद षष्ठी नाम से एक व्रत का उल्लेख भी है। बच्चे के जन्म के छठे दिन स्कंदमाता षष्ठी की पूजा भी प्राचीनकाल से होती आयी है। अत: सूर्य-पूजा तथा स्कंदमाता की पूजा की पृथक परंपरा एक साथ जुड़कर सूर्यपूजा में स्कंदषष्ठी समाहित हो गई है, किन्तु लोक संस्कृति में छठी मैया की अवधारणा सुरक्षित है।

और छठ आर्यावर्त के उस इलाके का उत्सव है जहाँ पंडित जी के पतरा से ज्यादा ज्ञान पण्डिताइन के अंचरा में रहता है।

सनातन विरोधियों को आमंत्रित करता हूँ कि बिहार और पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाए जाने वाले दुनिया के सबसे ‘इको फ्रेंडली’ ओर अपने मूल में संभवतः सबसे ‘फेमिनिस्ट’ त्योहार छठ महापर्व का लैंगिक विमर्श या जातीय विमर्श के लिहाज से अध्ययन करें।

आज जब बाजार ने ‘फेमिनिस्ट डिस्कोर्स,देहमुक्ति इत्यादि’ को ही बाजारवाद का हथियार बना दिया है, छठ अपने मूल स्वभाव में सह-अस्तित्व और धारणीय विकास के साथ साथ स्त्री सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उत्सव प्रमाणित हुई है।

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘परती परिकथा’ का एक पात्र स्त्री लोकगीतों के माध्यम से लोकमन और लोकजीवन को समझने की कोशिश करता है। अब इसी प्रकाश में देखिए ना छठ पर्व के इन अमर-गीतों को ….

“केरवा जे फरेला घवद से ओहपे सुग्गा मेड़राय..

.एक ही गीत में तुम्हारे सारे सैद्धांतिक ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘बायोडायवर्सिटी प्रिजर्वेशन’ सब हवा हो जाते हैं।

और ये “कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए…..”..बहंगी जो लचक रही है न..ये बिहार और पूर्वांचल के गरीब किसान की श्रद्धा और समृद्धि का बोझ है।

छठ पर्व में सुरसरि गंगा भी अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित हैं……’

मइया ए गंगा मइया,मांगिलां हम वरदान…’

कैसे दो विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधा जाता है…. यहाँ देखिए..
“ससुरा में मांगिले अन्न धन लक्ष्मी, नैहर सहोदर जेठ भाय हे छठी मइया….”

जिन्हें लगता है हिन्दुस्तानी औरत बस आंगन की तुलसी है…उनके लिए..
“छठी मईया सुतेली ओसारवा लट देली छितराय…”
छठ सबसे बड़ा स्वच्छ भारत अभियान भी है….

“कोपि-कोपि बोलेली छठी माई सूनि ए सेवका लोगवा हमरी घाटे दुबिया उपज गईले मकरी बसेरा लेले..”

कुछ सनातन धर्मी भी कहते हैं कि छठ सिर्फ प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना का त्योहार है ……सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” जिसका अर्थ है सूर्य जगत की आत्मा है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा व रोशनी ही जगत में ऊर्जा व चेतना भरती है।
सूर्य – ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)
देवी भागवत पढ़ लें एक बार वहाँ षष्ठी देवी का पूरा चरित्र है।

खैर, छठ के अनूठे स्वरूप को बर्बाद करने की कोशिश करने वाले तत्व भी पूरी मुस्तैदी से आ डंटे हैं। कल ही गांव में गाना सुना-“कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी करे चोयं चोंय चोंय”।

कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी तिथि को पारंपरिक रूप से विवस्वत् षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इसमें प्रधान रूप से संज्ञा सहित सूर्य की पूजा है।

पौराणिक परंपरा में संज्ञा को सूर्य की पत्नी कहा गया है। इस पर्व की परंपरा कम से कम 1000 साल प्राचीन है क्योंकि गहड़वाल राजा गोविंदचंद्र (12वीं शती का पूर्वाद्ध) के सभा पंडित लक्ष्मीधर कृत्यकल्पतरु में इस दिन सूर्य की पूजा का विधान किया है।

मिथिला के धर्मशास्त्री रुद्रधर (15वी शती) के अनुसार इस पर्व की कथा स्कंदपुराण से ली गई है। इस कथा में दुख एवं रोग नाश के लिए सूर्य का व्रत करने का उल्लेख किया गया है- भास्करस्य व्रतं त्वेकं यूयं कुरुत सत्तमा:। सर्वेषां दु:खनाशो हि भवेत्तस्य प्रसादत:।

षष्ठी तिथि को निराहार रहकर संध्या में नदी के तट पर जाकर धूप, दीप, घी, में पकाये हुए पकवान आदि से भगवान भास्कर की आराधना कर उन्हें अ‌र्घ्य दें। यहां अ‌र्घ्य-मंत्र इस प्रकार कहे गए हैं-

“नमोऽस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोऽस्तु वैश्वानर जातवेदसे। त्वमेव चाघर्य प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।। नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे। दत्तमघ्र्य मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकर।। एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। गृहाणाघ्र्य मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।”

शिव की शक्ति से उत्पन्न कार्तिकेय को छह कृतिकाओं ने दूध पिलाकर पाला था। अत: कार्तिकेय की छह माताएं मानी जाती हैं। और उन्हें षाण्मातर् भी कहा जाता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि कृतिका नक्षत्र छह ताराओं का समूह भी है तथा स्कंद षष्ठी नाम से एक व्रत का उल्लेख भी है। बच्चे के जन्म के छठे दिन स्कंदमाता षष्ठी की पूजा भी प्राचीनकाल से होती आयी है। अत: सूर्य-पूजा तथा स्कंदमाता की पूजा की पृथक परंपरा एक साथ जुड़कर सूर्यपूजा में स्कंदषष्ठी समाहित हो गई है, किन्तु लोक संस्कृति में छठी मैया की अवधारणा सुरक्षित है।

डॉ, मधुसूदन उपाध्याय

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