गांव जवार के बरम बाबाओं में छिपा है असल भारत

गाँवों में ‘बरम बाबा’ का स्थान पाया जाता है – ब्राह्मण अनुशासन का गँवई रूप। नीम,पीपल, बरगद, पाकड़ आदि के किसी वृक्ष के नीचे सादा सा चबूतरा बना दिया जाता है।

जहां मन्नत स्वरूप जेवनार चढ़ाया जाता है। गोंइठी की आग पर गाय के दूध में चावल डाल छोड़ दिया जाता है। दूध उफन कर बाहर गिरता है, तब प्रसाद स्वरूप इस फीकी खीर को उतार कर बाँट दिया जाता है।

इसे ‘जेवनार’ क्यों कहते हैं? इस शब्द की व्युत्पत्ति क्या है?

सोने की थाली में जेवना परोसे ……’

में जेवना का अर्थ व्यंजन हो सकता है. जेवना का आहार जेवनार (विशिष्ट गण भोज) के अर्थ में प्रयुक्त लगता है.
मेरी समझ में इसके मूल में जिम्‌ धातु है जिसका अर्थ होता है खाना। पुरानी हिन्दी में इस से निकला शब्द जीमना चलता था.. मराठी में भी खाने को जेवण कहते हैं।
जब बड़ी पंगत होती है बहुत से लोगों को एक साथ बैठा कर भोजन कराया जाता है उसे ही जेवनार कहते हैं। हि्न्दी में इस का रुप ज्यौनार है।

छत्तीसगढ़ में जेवन, सामान्‍यतः रात के भोजन के लिए प्रयुक्‍त होता है और बर्तन को जेवनहा भी कहा जाता है।

मालवी, राजस्थानी बोलियों में जीमना शब्द भी खाने अथवा भोजन के अर्थ में इस्तेमाल होता है। जीमना शब्द बना है संस्कृत धातु जम् से जिसका मतलब होता है आहार। जम् से ही बना है जमनम् जिसमें भोजन, आहार आदि का ही भाव है। इसका एक रूप जेमनम् भी है। मराठी में इसका रूप हो जाता है जेवणं। हिन्दी में इसका क्रिया रूप बनता है जीमना और राजस्थानी में जीमणा। पूर्वी हिन्दी में इसे ज्योनार या जेवनार कहा जाता है। जीमण, ज्योनार शब्दों का लोकगीतों में बड़ा मधुर प्रयोग होता आया है। शादी में विवाह-भोज को ज्योनार कहा जाता है। यह एक रस्म है।

संस्कृत में पुत्री के लिए जामा शब्द है। इमें पुत्रवधु का भाव भी निहित है। जामिः का अर्थ भी स्त्रीवाची है जिसमें बहन, पुत्री, पुत्रवधु, निकट संबंधी स्त्री, गुणवती स्त्री आदि। ये दोनो शब्द बने हैं जम् धातु से जिसका अर्थ होता है भोजन। जीमण, ज्योनार जैसे शब्द इसी जम् धातु से बने हैं। जम् में ज वर्ण में निहित उत्पन्न करना जैसा भाव शामिल है। जम् अर्थात आहार ही जीवन का मुख्य आधार है।

हमारे समाज में पारंपरिक तौर पर भोजन निर्माण का काम स्त्री ही करती आई है इसीलिए जम् से बने जामिः अथवा जामा में भोजन निर्माण करनेवाली स्त्री का भाव भी निहित है। इसी क्रम में आता है जाया शब्द जिसका अर्थ है पत्नी। दम्पती की तर्ज पर पति-पत्नी के लिए जायापति या जम्पती शब्द भी है।

परन्तु हमारे तरफ ज्यौनार चढ़ाने और बनाने का काम पुरूष ही करते आए हैं। वह कोई बाबा का प्रिय सेवइक(पंचरा वाली भाषा में सेवक सेवइक हो जाता है #पंचरा क्या होता है यह जानने के लिए आपको मेरे जैसे ही किसी सेवइक के गले से सुनना पड़ेगा) होता है या फिर , साधारणतया कुल का वयोवृद्ध व्यक्ति यह कर्तव्य अधिकार के साथ निभाता है।

साल भर में बाबा को पांच जेवनार चढ़ने चाहिए-

१.शारदीय नवरात्रि की सप्तमी को
२.श्रावण शुक्ला सप्तमी को
३.होली को
४-दीपावली के बाद गोधन को
५-नागपंचमी के दिन खलिहान में या घर पर

उपले (गोइठा) की आग में गाय के दूध और चावल से मिट्टी के बर्तन में पकाया जाने वाला ज्यौनार इन प्राकृतिक शक्तियों को बिना किसी अप्राकृतिक या कृत्रिम वस्तु का प्रयोग किये केले के पत्ते या कटहल के पत्ते पर रखकर अर्पित किया जाता है।

पूजा या उपासना का कितना अच्छा रूप है न ,बिना किसी शोर शराबे के, बिना किसी ताम झाम के, बिना किसी बड़े खर्च-वर्च के, बिना किसी की भावनाओं को आहत किये या बिना किसी को उत्तेजित किये जाने कबसे ये ज्यौनार चढ़ाए जाते रहे हैं. अपनी स्थानीयता और देसजता को बचाए रखते हुए.
इसके स्वाद का भी कोई विकल्प नहीं है कितना भी सूखा मेवा और रबड़ी या मिल्कमेड या कस्टर्ड पाउडर डालकर खीर बना लीजिए, ज्योनार के स्वाद से उसकी तुलना नहीं हो पाएगी.

भौतिकता की आंधी हमारे ज्योनार को भी खत्म करती जा रही है. आज की पिज्जा, बर्गर और मैगी वाली पीढ़ी इस देसजता को अपने तथाकथित स्मार्टनेस और स्टेटस के विरुद्ध पाती है. ज्यौनार का खत्म होना प्रकृति के प्रति स्नेह के साथ स्थानीयता का खत्म होना भी है।

देखिएगा कहीं ऐसा न हो कि ग्लोबल विलेज के चक्कर में आपका गांव विलेज में बिला जाए।

डा.मधुसूदन उपाध्याय

छठ पूजा, नारी प्रतिष्ठा का स्थापना पर्व

इक्कीसवीं शताब्दी में नालेज इज पावर है… है ना…..

और छठ आर्यावर्त के उस इलाके का उत्सव है जहाँ पंडित जी के पतरा से ज्यादा ज्ञान पण्डिताइन के अंचरा में रहता है। भारत विरोधियों को आमंत्रित करता हूँ कि बिहार और पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाए जाने वाले दुनिया के सबसे ‘इको फ्रेंडली’ ओर अपने मूल में संभवतः सबसे ‘फेमिनिस्ट’ त्योहार छठ महापर्व का लैंगिक विमर्श या जातीय विमर्श के लिहाज से अध्ययन करें।

आज जब बाजार ने ‘फेमिनिस्ट डिस्कोर्स,   देहमुक्ति इत्यादि’ को ही बाजारवाद का हथियार बना दिया है, छठ अपने मूल स्वभाव में सह-अस्तित्व और धारणीय विकास के साथ साथ स्त्री सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उत्सव प्रमाणित हुई है।

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘परती परिकथा’ का एक पात्र स्त्री लोकगीतों के माध्यम से लोकमन और लोकजीवन को समझने की कोशिश करता है। अब इसी प्रकाश में देखिए ना छठ पर्व के इन अमर-गीतों को ….

“केरवा जे फरेला घवद से ओहपे सुग्गा मेड़राय…”…

एक ही गीत में तुम्हारे सारे सैद्धांतिक ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘बायोडायवर्सिटी प्रिजर्वेशन’ सब हवा हो जाते हैं।
और ये “कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए…..”..बहंगी जो लचक रही है न..ये बिहार और पूर्वांचल के गरीब किसान की श्रद्धा और समृद्धि का बोझ है।

छठ पर्व में सुरसरि गंगा भी अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित हैं……’मइया ए गंगा मइया,मांगिलां हम वरदान…’

कैसे दो विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधा जाता है…. यहाँ देखिए..
“ससुरा में मांगिले अन्न धन लक्ष्मी, नैहर सहोदर जेठ भाय हे छठी मइया….”

जिन्हें लगता है हिन्दुस्तानी औरत बस आंगन की तुलसी है…उनके लिए..
“छठी मईया सुतेली ओसारवा लट देली छितराय…”
छठ सबसे बड़ा स्वच्छ भारत अभियान भी है….

“कोपि-कोपि बोलेली छठी माई सूनि ए सेवका लोगवा हमरी घाटे दुबिया उपज गईले मकरी बसेरा लेले..”
कुछ सनातन धर्मी भी कहते हैं कि छठ सिर्फ प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना का त्योहार है ……सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” जिसका अर्थ है सूर्य जगत की आत्मा है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा व रोशनी ही जगत में ऊर्जा व चेतना भरती है।
सूर्य – ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)
देवी भागवत पढ़ लें एक बार वहाँ षष्ठी देवी का पूरा चरित्र है।

खैर, छठ के अनूठे स्वरूप को बर्बाद करने की कोशिश करने वाले तत्व भी पूरी मुस्तैदी से आ डंटे हैं। कल ही गांव में गाना सुना-“कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी करे चोयं चोंय चोंय”।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी तिथि को पारंपरिक रू प से विवस्वत् षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इसमें प्रधान रूप से संज्ञा सहित सूर्य की पूजा है।

पौराणिक परंपरा में संज्ञा को सूर्य की पत्नी कहा गया है। इस पर्व की परंपरा कम से कम 1000 साल प्राचीन है क्योंकि गहड़वाल राजा गोविंदचंद्र (12वीं शती का पूर्वाद्ध) के सभा पंडित लक्ष्मीधर कृत्यकल्पतरु में इस दिन सूर्य की पूजा का विधान किया है।

मिथिला के धर्मशास्त्री रुद्रधर (15वी शती) के अनुसार इस पर्व की कथा स्कंदपुराण से ली गई है। इस कथा में दुख एवं रोग नाश के लिए सूर्य का व्रत करने का उल्लेख किया गया है- भास्करस्य व्रतं त्वेकं यूयं कुरुत सत्तमा:। सर्वेषां दु:खनाशो हि भवेत्तस्य प्रसादत:।

षष्ठी तिथि को निराहार रहकर संध्या में नदी के तट पर जाकर धूप, दीप, घी, में पकाये हुए पकवान आदि से भगवान भास्कर की आराधना कर उन्हें अ‌र्घ्य दें। यहां अ‌र्घ्य-मंत्र इस प्रकार कहे गए हैं-

“नमोऽस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोऽस्तु वैश्वानर जातवेदसे। त्वमेव चाघर्य प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।। नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे। दत्तमघ्र्य मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकर।। एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। गृहाणाघ्र्य मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।”

शिव की शक्ति से उत्पन्न कार्तिकेय को छह कृतिकाओं ने दूध पिलाकर पाला था। अत: कार्तिकेय की छह माताएं मानी जाती हैं। और उन्हें षाण्मातर् भी कहा जाता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि कृतिका नक्षत्र छह ताराओं का समूह भी है तथा स्कंद षष्ठी नाम से एक व्रत का उल्लेख भी है। बच्चे के जन्म के छठे दिन स्कंदमाता षष्ठी की पूजा भी प्राचीनकाल से होती आयी है। अत: सूर्य-पूजा तथा स्कंदमाता की पूजा की पृथक परंपरा एक साथ जुड़कर सूर्यपूजा में स्कंदषष्ठी समाहित हो गई है, किन्तु लोक संस्कृति में छठी मैया की अवधारणा सुरक्षित है।

और छठ आर्यावर्त के उस इलाके का उत्सव है जहाँ पंडित जी के पतरा से ज्यादा ज्ञान पण्डिताइन के अंचरा में रहता है।

सनातन विरोधियों को आमंत्रित करता हूँ कि बिहार और पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाए जाने वाले दुनिया के सबसे ‘इको फ्रेंडली’ ओर अपने मूल में संभवतः सबसे ‘फेमिनिस्ट’ त्योहार छठ महापर्व का लैंगिक विमर्श या जातीय विमर्श के लिहाज से अध्ययन करें।

आज जब बाजार ने ‘फेमिनिस्ट डिस्कोर्स,देहमुक्ति इत्यादि’ को ही बाजारवाद का हथियार बना दिया है, छठ अपने मूल स्वभाव में सह-अस्तित्व और धारणीय विकास के साथ साथ स्त्री सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उत्सव प्रमाणित हुई है।

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘परती परिकथा’ का एक पात्र स्त्री लोकगीतों के माध्यम से लोकमन और लोकजीवन को समझने की कोशिश करता है। अब इसी प्रकाश में देखिए ना छठ पर्व के इन अमर-गीतों को ….

“केरवा जे फरेला घवद से ओहपे सुग्गा मेड़राय..

.एक ही गीत में तुम्हारे सारे सैद्धांतिक ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘बायोडायवर्सिटी प्रिजर्वेशन’ सब हवा हो जाते हैं।

और ये “कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए…..”..बहंगी जो लचक रही है न..ये बिहार और पूर्वांचल के गरीब किसान की श्रद्धा और समृद्धि का बोझ है।

छठ पर्व में सुरसरि गंगा भी अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित हैं……’

मइया ए गंगा मइया,मांगिलां हम वरदान…’

कैसे दो विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधा जाता है…. यहाँ देखिए..
“ससुरा में मांगिले अन्न धन लक्ष्मी, नैहर सहोदर जेठ भाय हे छठी मइया….”

जिन्हें लगता है हिन्दुस्तानी औरत बस आंगन की तुलसी है…उनके लिए..
“छठी मईया सुतेली ओसारवा लट देली छितराय…”
छठ सबसे बड़ा स्वच्छ भारत अभियान भी है….

“कोपि-कोपि बोलेली छठी माई सूनि ए सेवका लोगवा हमरी घाटे दुबिया उपज गईले मकरी बसेरा लेले..”

कुछ सनातन धर्मी भी कहते हैं कि छठ सिर्फ प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना का त्योहार है ……सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” जिसका अर्थ है सूर्य जगत की आत्मा है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा व रोशनी ही जगत में ऊर्जा व चेतना भरती है।
सूर्य – ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)
देवी भागवत पढ़ लें एक बार वहाँ षष्ठी देवी का पूरा चरित्र है।

खैर, छठ के अनूठे स्वरूप को बर्बाद करने की कोशिश करने वाले तत्व भी पूरी मुस्तैदी से आ डंटे हैं। कल ही गांव में गाना सुना-“कांचहि बांस के बहंगिया बहंगी करे चोयं चोंय चोंय”।

कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी तिथि को पारंपरिक रूप से विवस्वत् षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इसमें प्रधान रूप से संज्ञा सहित सूर्य की पूजा है।

पौराणिक परंपरा में संज्ञा को सूर्य की पत्नी कहा गया है। इस पर्व की परंपरा कम से कम 1000 साल प्राचीन है क्योंकि गहड़वाल राजा गोविंदचंद्र (12वीं शती का पूर्वाद्ध) के सभा पंडित लक्ष्मीधर कृत्यकल्पतरु में इस दिन सूर्य की पूजा का विधान किया है।

मिथिला के धर्मशास्त्री रुद्रधर (15वी शती) के अनुसार इस पर्व की कथा स्कंदपुराण से ली गई है। इस कथा में दुख एवं रोग नाश के लिए सूर्य का व्रत करने का उल्लेख किया गया है- भास्करस्य व्रतं त्वेकं यूयं कुरुत सत्तमा:। सर्वेषां दु:खनाशो हि भवेत्तस्य प्रसादत:।

षष्ठी तिथि को निराहार रहकर संध्या में नदी के तट पर जाकर धूप, दीप, घी, में पकाये हुए पकवान आदि से भगवान भास्कर की आराधना कर उन्हें अ‌र्घ्य दें। यहां अ‌र्घ्य-मंत्र इस प्रकार कहे गए हैं-

“नमोऽस्तु सूर्याय सहस्रभानवे नमोऽस्तु वैश्वानर जातवेदसे। त्वमेव चाघर्य प्रतिगृह्ण गृह्ण देवाधिदेवाय नमो नमस्ते।। नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे। दत्तमघ्र्य मया भानो त्वं गृहाण नमोऽस्तु ते।।
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकर।। एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। गृहाणाघ्र्य मया दत्तं संज्ञयासहित प्रभो।”

शिव की शक्ति से उत्पन्न कार्तिकेय को छह कृतिकाओं ने दूध पिलाकर पाला था। अत: कार्तिकेय की छह माताएं मानी जाती हैं। और उन्हें षाण्मातर् भी कहा जाता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि कृतिका नक्षत्र छह ताराओं का समूह भी है तथा स्कंद षष्ठी नाम से एक व्रत का उल्लेख भी है। बच्चे के जन्म के छठे दिन स्कंदमाता षष्ठी की पूजा भी प्राचीनकाल से होती आयी है। अत: सूर्य-पूजा तथा स्कंदमाता की पूजा की पृथक परंपरा एक साथ जुड़कर सूर्यपूजा में स्कंदषष्ठी समाहित हो गई है, किन्तु लोक संस्कृति में छठी मैया की अवधारणा सुरक्षित है।

डॉ, मधुसूदन उपाध्याय

डिजिटल युग में प्राइवेसी के मायने बदल गए हैं

एक अंग्रेजी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि आपका आधार नंबर सेफ नहीं है. रिपोर्टर ने लिखा कि उन्होंने वॉट्सऐप के जरिए सर्विस देने वाले एक ट्रेडर से आधार कार्डधारकों की जानकारी जैसे कि नाम, पता, जन्म तिथि आदि खरीदी. जिसके लिए उसे 12 डिजिट वाला यूनीक आइडेंटिटी नंबर दर्ज करना होता था.
मजे की बात यह है कि अमेरिका में आप किसी भी व्यक्ति का नाम और उसका शहर डालकर उसके बारे में सारी जानकारी एकत्र कर सकते हैं. अगर आप के पास उसका टेलीफोन नंबर है, तो उससे भी सारी जानकारी मिल जाएगी. सिर्फ Google में डालिए और वह आपको कई ऐसी कंपनी की वेबसाइट पे ले जाएगा जो मात्र 65 रुपये से 330 रुपये ले कर आप को उसका सारा कच्चा-चिट्ठा खोलकर बता देंगे. इन जानकारियों में उसका फोन नंबर, सारी प्रॉपर्टी का विवरण, ईमेल, उम्र, पता, इनकम, उसके अपराध का रिकॉर्ड, क्या वह किसी सेक्स अपराध में शामिल था, यह सब आपको मिल जाएगा. इसके अलावा उसके परिवार के सदस्यों की भी पूरी जानकारी मिल जाएगी, यह भी कि वह कहां पढ़े हैं और कितनी जगह पर नौकरी की है.
अमेरिका मेंअगर कोई व्यक्ति अपना नाम गूगल पर डाले तो उसे फ्री में ही इस बात की जानकारी मिल जाएगी कि उसके पास क्या प्रॉपर्टी है, कौन-कौन उस प्रॉपर्टी का स्वामी है, कितना लोन है, और कितने डॉलर में वह प्रॉपर्टी किस दिन और किस व्यक्ति से खरीदी गई है.
और तो और अगर आप ब्रिटेन में किसी कंपनी के स्वामित्व का पता करना चाहते हैं तो वह भी इंटरनेट पर फ्री में उपलब्ध है. भारतीय समाचार पत्रों ने ऐसे ही पता लगाया था कि विजय माल्या और राहुल गांधी की वहां पर क्या-क्या प्रॉपर्टी है और उनका सिविल स्टेटस यानी कि नागरिकता का स्टेटस क्या है?
इसके अलावा कोई भी कंपनी या व्यक्ति अमेरिका में कुछ विशेष कंपनी को पैसा देकर मेरी क्रेडिट हिस्ट्री – यानी कि मेरे पास कितने क्रेडिट कार्ड हैं, उस क्रेडिट की क्या सीमा है, मैंने क्रेडिट कार्ड का कैसे प्रयोग किया, और मेरे क्रेडिट पेमेंट या लोन चुकता करने का क्या रिकॉर्ड है – पिछले कितने भी वर्षों का रिकॉर्ड वह चाहें, मिल जाएगा. इसके लिए क्रेडिट कार्ड का डाटा रखने वाली कंपनी को मेरी परमिशन की आवश्यकता नहीं है. मुझे भी साल में एक बार यह जानकारी फ्री में प्राप्त करने का अधिकार है कि किसने मेरे क्रेडिट कार्ड का रिकॉर्ड खरीदा. हर बार मैं देखता हूं कि बैंक या इंश्योरेंस कंपनी मेरे क्रेडिट कार्ड का रिकॉर्ड उस कंपनी से खरीदते रहते हैं.
कई बार भारत में मित्रों ने किसी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर एक फ़ोन पर SMS किया तुरंत उस गाड़ी के मालिक और उसका पता SMS पर आ गया.
बायोमेट्रिक तथा अन्य निजी सूचना केवल एप्पल या सैमसंग फ़ोन के पास ही नहीं है, बल्कि उन सारे स्मार्टफोन जो एंड्राइड प्लेटफार्म पे बने है (एप्पल के अलावा बाकि सारे स्मार्टफोन एंड्राइड तकनीकी का प्रयोग करते है), उनके पास भी होती है.
आज के डिजिटल युग में प्राइवेसी के मायने बदल गए हैं. सारी की सारी व्यक्तिगत सूचनाएं वेबसाइट पर उपलब्ध हैं. अतः ऐसे वातावरण में इस बात की सनसनी फैलाना कि आधार नंबर डालकर फलानी जानकारी मिल गई, यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. यह सिर्फ आपकी बदनियती दर्शाती है.
प्रश्न यह है कि क्या आप को बायोमेट्रिक सूचना मिली?
उत्तर है: नहीं.
तो हल्ला फिर किस बात का है?

अमित सिंघल

न्यू यॉर्क की कहानी, मेरी जुबानी

न्यू यॉर्क शहर की गहमा-गहमी अन्य शहरो से अलग है. जब मैं नौकरी के लिए पहली बार अमेरिका आया और न्यू यॉर्क के JFK एयरपोर्ट के इमीग्रेशन काउंटर की तरफ सपरिवार बड़ा, तो एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिका में आपका स्वागत है और हमें अमेरिकी समझ के इस देश के नागरिको वाली लाइन ज्वाइन करने को कहा. इसके पहले हर देश में हमें विदेशी समझा गया था, जो हम है.
खैर, कार्यालय ज्वाइन किया. कुछ ही समय में नोटिस किया कि मेरी सभी महिला सहकर्मी बहुत ही फैशनेबल है, कम से कम लाख-दो लाख रुपये के कपड़े पहने हुए, चेहरे पे बेहतरीन मेक-अप, कंधे पे उतना ही महंगा पर्स और साथ में बड़ा सा टॉट (बोरे वाला टॉट नहीं, tote) बैग.
लेकिन ऑफिस में प्रवेश करते समय वे स्पोर्ट्स शूज जैसे कि नाइके या अडीडास पहने रहती थी. कुछ ही देर बाद वे महंगे पम्पस (हाई हील वाली जूतियाँ) या बूट्स में दिखाई देती थी. कुल मिलकर शरीर पे 3 से 5 लाख रुपये के कपड़े, बैग, पर्स, जूते.
यही हाल पुरुषो का है. महंगे सूट, टाई, ओवरकोट, लेकिन जूता स्पोर्ट्स वाला. ऑफिस में आने के कुछ समय बाद एकदम चमचमाता हुआ टॉप क्लास मैच करता हुआ जूता.
अगर आप किसी न्यू यॉर्कर से सुबह ऑफिस जाते हुए या सांय वापस लौटते हुए सड़क पे मिले तो सोचेंगे कि कैसा खिसका हुआ आदमी या खिसकी हुई औरत है. कपड़े, बैग चका-चक, लेकिन जूते सड़क छाप.
इसका रहस्य यह है कि न्यू यॉर्क की लाइफ किसी अन्य शहर की तुलना में अविश्सनीय रूप से फ़ास्ट है. हर समय लोग भागते रहते है. मैंने नोटिस किया कि लोग फुटपाथ पे चलते हुए डिस्पोजेबल (दफ़्ती या प्लास्टिक के) ग्लास में कॉफ़ी पीते है, एक बड़ी सी सैंडविच या प्रोटीन बार का नाश्ता और लंच करते है. बैठकर खाने के लिए भी समय नहीं है.
यहाँ तक कि मैंने लोगो को ऑफिस में सुबह-सुबह शेव और दांत ब्रश करते हुए देखा है. पॉटी तो लगभग हर व्यक्ति ऑफिस में ही करता है (नहीं, मैं उन्हें पॉटी करते नहीं देखता, लेकिन टॉयलेट के दरवाजे जमीन से दो फ़ीट ऊपर शुरू होते है और आप एड़ियों तक उतरी पैंट देख सकते है).
ट्रैन में रोज सुबह महिलाये बैठते ही सभी के सामने मेक-अप करना शुरू कर देती है. और मेक-अप भी केवल लिपस्टिक तक सीमित नहीं रहता. आधे घंटे तक फाउंडेशन, ब्लशर, लिपस्टिक, ऑय-लाइनर, मस्कारा, फाल्स आई लैशेस, बालो को सवारने इत्यादि के बाद बिलकुल हॉलीवुड की हीरोइन का अवतार बाहर निकलता है.
लोग इतने व्यस्त है कि हर दिन फुटपाथ पे चलते हुए एक-आध लोग पुस्तक पढ़ते हुए मिल जायेगे. पुस्तक भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, बल्कि हार्ड कवर वाली. सेल फ़ोन पे ईमेल या मेसेज लिखते हुए, पढ़ते हुए, कान में इयरफोन लगा के म्यूजिक सुनते हुए हर व्यक्ति बाहर की दुनिया से विरक्त है, जैसे उसने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो.
इन सब के बावजूद हर व्यक्ति इतना तेज चलता है जैसे कि ओलिंपिक में भाग ले रहा हो. ऐसे में अगर हाई हील के जूते या फॉर्मल जूते पहन लिए, तो गिर जाने की संभावना बढ़ जाती है.
इसके विपरीत, मैं आराम से चलता हूँ, सेल फ़ोन जेब में, आँख-कान सतर्क और खुले हुए. न्यू यॉर्क के फुटपाथ एवं सड़को की ध्वनि और दृश्यों का आनंद लेता हूँ. कई बार किसी ट्रैफिक लाइट पे पर्यटक मुझे रोक कर रास्ता या पता पूछते है. पहले तो समझ नहीं आता था कि मुझसे ही क्यों पूछते है. फिर समझ में आया कि मैं ही एक फ्री व्यक्ति हूँ, बाकी सब बिजी है नाश्ता करने में, फ़ोन करने में, म्यूजिक सुनने में, टेक्स्ट करने में.
एक बार निर्धन से दिखने वाले, उद्वेलित से, व्यक्ति ने रोका, अपनी कलाई पे जहाँ घड़ी बंधी होती है, उस तरफ इशारा किया, दोनों हाथो की तर्जनी से हवा में एक स्क्वायर या वर्ग बनाया. और आँखों से मेरी तरफ कुछ प्रश्न सा किया.
मैं तुरंत समझ गया.
वे मूक-बधिर सज्जन मुझसे टाइम्स स्क्वायर का रास्ता पूछ रहे थे.

अमित सिंघल

आखिर हमारे “युवा” नेताओ की भारत के बारे में क्या महत्वाकांक्षा है?

कुछ समय से मीडिया युवा नेताओ कन्हैया, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर इत्यादि को प्रमोट करता आ रहा है. कुछ तो चुनाव भी जीत गए है. भारत के टुकड़े की परिकल्पना करने वाले देशद्रोहियो को छोड़कर अन्य युवा नेताओ को मेरी शुभकामनाये.
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इन नेताओं की सोच क्या है? उनका हमारे राष्ट्र के बारे में क्या विज़न है? क्या उनके विचार भारत के बहुसंख्यक लोगो को प्रेरित करते है? क्या उन्होंने ऐसा कोई उच्च विचार प्रस्तुत किया जो सभी भारतीयों की भलाई और प्रगति के बारे में हो? क्या वे सभी समुदाय और महिलाओं को प्रेरित कर सकने की क्षमता रखते है? ऐसी क्या बात है कि उनके विचार आज के युवाओं और युवतियों की आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा को संबोधित नहीं करते?
मैं यह क्लेम तो कर ही सकता हूँ कि मैं फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल माक्रों के साथ पढ़ा हूँ और उनकी जीवन-यात्रा को नज़दीक से देखा है. क्या बात थी कि 39 वर्ष की आयु में उन्हें फ्रांस की बहुसंख्यक जनता ने राष्ट्रपति चुन लिया (फ्रांस का राष्ट्रपति जनता चुनती है)? क्या विज़न था उनका? ऐसा क्या प्रोग्राम था उनका कि शहरी जनता, किसान, फैक्ट्री वर्कर, छात्र, महिलाये, सभी के वोट उन्हें मिल गए, एवं अनुभवी अधेड़ और प्रौढ़ नेतागणो को उन्होंने पछाड़ दिया?
कैंडिडेट माक्रों ने फ्रांस के सभी युवाओ को यह बतलाया कि उन्हें बेरोजगारी क्यों झेलनी पड़ रही है? माक्रों के अनुसार, अगर कोई प्राइवेट कंपनी किसी युवा को जॉब देती है, तो फ्रांस के नियमानुसार उस कर्मचारी को जॉब से नहीं निकाला जा सकता, भले ही कंपनी को घाटा हो रहा हो, या कंपनी के उत्पाद की लागत अन्य प्रतियोगियों से महँगी हो. माक्रों ने समझाया कि कैसे यह नियम नयी कंपनी और उद्यमों को फ्रांस में आने से रोकता है, कैसे यह नए लोगो को जॉब देने में असहायक सिद्ध होता है क्योकि कंपनियों को डर लगता है कि वे किसी भी कर्मचारी को नहीं निकाल पाएंगे भले ही कंपनी दिवालिया हो जाए. उन्होंने कहा कि अगर वह राष्ट्रपति बन गए तो वह नौकरी पे रखने और निकालने के नियम में ढील दे देंगे.
ध्यान दीजिये – माक्रों क्या कह रहे है? यह सिर्फ एक उदाहरण है. ऐसी बहुत सी बाते है जिसमे माक्रों ने सभी फ्रेंच नागरिको को कठिन निर्णयों के लिए आगाह किया और फ्रांस को आतंकी हमले से सुरक्षित करने का विश्वास दिलाया.
इसके विपरीत, हमारे युवा नेता सिर्फ और सिर्फ जातिवाद और आरक्षण की बात कर रहे है. उनका पूरा प्लेटफार्म ही इस बात का है कैसे “उनकी” जाति वालो को आरक्षण मिल सके, कैसे सेकुलरिज्म के स्लोगन पे भारत के बहुसंख्यक समाज का मजाक उड़ा सके, कैसे किसी एक समुदाय की तुष्टि कर सके.
दूसरे शब्दों में, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे भारत के सभी – सभी – युवाओ को कैसे रोजगार उपलब्ध कराएँगे, उसके लिए क्या कठिन निर्णय करने होंगे, कैसे प्रदूषण कम करेंगे और साथ ही उद्योगों का विकास करेंगे? कैसे किसानो को उनके उत्पाद का अधिक मूल्य देंगे, साथ ही उपभोक्ताओं को सस्ता अन्न उपलब्ध कराएँगे?
कैसे स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देंगे? कैसे सड़के बनवाएंगे, रेलवे का विकास करेंगे, मेधा पटकर के विरोध के बावजूद सिंचाई की व्यवस्था करेंगे, और विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओ से मुकाबला करेंगे जो भारत के विकास में आकाओ के इशारो पे बाधा डाल रहे हैं?
आरक्षण को उनके ही अभिजात वर्ग ने कब्जिया लिया है. एक ही खानदान की चौथी पीढ़ी आरक्षण का मजा ले रही है. इसमें संशोधन की आवश्यकता है, जिससे उन्ही शुद्र और पिछड़े वर्ग के वंचित लोगो को आरक्षण का लाभ पहली बार मिले. इसके बारे में उनके क्या विचार है?
कैसे सीमा पार से आने वाले आतंकवाद का मुकाबला करेंगे? कैसे जम्मू और कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद से निपटेंगे? कैसे पड़ोस के फर्जी “साम्यवादी” देश के खतरे से मुकाबला करेंगे?
अंत में, कैसे इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि राजनीति से वंशवाद को दूर किया जा सके?
क्या उन युवा नेताओ के पास कोई बोल्ड विचार है, जिससे वे सभी भारतीयों के विचारो को प्रभावित कर सके?
मुझे राष्ट्र के विकास के बारे में, उन्नति के बारे में, सभी भारतीयों की प्रगति के बारे में उनके विचार जानने की उत्सुकता है.

अमित सिंघल