ह्रदय रोग में कारगर झरबेरी

बेर तो सभी जगह मिल जाते हैं… पर झरबेरी के बेर तो अब दुर्लभ से हो गए हैं…. झरबेरी को झड़बेर या जंगली बेर भी कहते हैं,,हमारे इधर इसे #बोरजाली कहते हैं…. इसके बेर बहूत ही खट्टे मीठे होते हैं… बेर की जब बहार होती है तो पत्तो से ज्यादा फल दिखते हैं…।।

आयुर्वेद के अनुसार बेर ह्वदय के लिए काफी फायदेमंद होते हैं….इन्हे खाने से बार-बार प्यास लगने की शिकायत नहीं रहती….बेर को सुखाकर और बारीक पीसकर बनाया गया सत्तू कफ व वायु दोषों का नाश करता है…..बेर को नमक और काली मिर्च के साथ खाने से अपच की समस्या दूर होती है।

झरबेरी से जुड़ी कोई जानकारी या अनुभव हो तो साझा करें..।

नंदकिशोर प्रजापति कानवन

खर पतवार नहीं बात नाशक हर निर्गुन्डी

हमारे आस पास कई औषधि पौधे बिखरे पड़े हैं ,कोई पहाड़ पर तो कोई नदियों,मैदानों पर तो कुछ फसलों में खरपतवार के रूप में,,लेकिन शायद पहचान और जानकारी न होने के कारण हम उनके गुणों से अनजान होते हैं ..ऐसा ही एक औषधि पौधा है जिसे “निर्गुन्डी ” कहते हैं…जो शरीर क़ी रोगों से रक्षा करे वह निर्गुन्डी होती है” …इसे वात से सम्बंधित बीमारियों में रामबाण औषधि माना गया है ,,छह से बारह फुट उंचा इसका पौधा,झाड़ीनुमा सूक्ष्म रोमों से ढका रहता है ,पत्तियों क़ी एक ख़ास पहचान किनारों से क़ी जा सकती है,इसके फल छोटे और गोल होते हैं…. कुछ दिनों पहले माही नदी के तट पर जाना हुआ जहाँ यह पौधा हजारो की संख्या मिला,,वहाँ आदिवासी लोग इसे नैगड़ कहते हैं… उनके अनुसार चोट लगने या सूजन होने पर इसकी पत्तियों को कूटकर बांधा जाता है…वही बच्चो के गले मे इसकी जड़ को भी बांधते हैं ताकि दांत जल्दी निकल आये…।


निर्गुन्डी को संभालू/सम्मालू, शिवारी, निसिन्दा शेफाली,गुजरात मे नेगड़ संस्कृत में इंद्राणी,नीलपुष्पा,सिन्दुवार आदि नामो से जाना जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार यह कफवातशामक औषधि के रूप में जानी जाती है ,जिसे श्रेष्ठ वेदनास्थापन अर्थात दर्द को कम करने वाला माना गया है… यह घाव को विसंक्रमित करनेवाला ,भरनेवाले गुणों से युक्त होता है…


इसकी पत्तियों का काढा बनाकर कुल्ला करने मात्र से गले का दर्द जाता रहता है वही
कटे-फ़टे होठ पर केवल इसके तेल को लगाने से लाभ मिल जाता है… I
#साइटिका ओर #स्पेनडिक्स रोग में निर्गुन्डी रामबाण इलाज है..।
अनेक रोगों में ईसकी पत्तियाँ,छाल, जड़े, बीज और तेल बहुत ही लाभकारी सिद्ध होते हैं..।

निर्गुन्डी से जुड़ी कोई जानकारी हो तो अवश्य शेयर करे…।
नंदकिशोर प्रजापति कनावन

डॉ आंबेडकर और मनु स्मृति

साल 1927, अम्बेडकर साहब ने कुछ लोगों के साथ मिलकर मनुस्मृति जलाई।नब्बे साल बाद उदित राज भाजपा वाले को भी जरूरत पड़ रही है पुस्तकें जलाने की।

यूनानी नाटककार एशीलस ने सच ही कहा था कि ‘युद्ध का सबसे पहला शिकार सत्य ही बनता है।’ यह बात अंध-दुराग्रह वाले वैचारिक युद्धों पर भी लागू होती है। इनका भी सबसे पहला शिकार सत्य ही बनता है, धर्म ही बनता है। इसका शिकार बनना पड़ता है मानवीय उदारता, विनम्रता, व्यापकता और वैज्ञानिकता को।

हम विज्ञान युग की पीढ़ी हैं।ये किताबें जलाने जैसे मध्ययुगीन तरीके हमें शोभा नहीं देते. अतीत में पुस्तकालयों के ही दहन का काम नालंदा, अलेक्ज़ान्द्रिया और अल-हकम से लेकर कुस्तुनतुनिया तक में कुछ सिरफिरे लोगों ने किया था। हम ऐसा क्यों करें।दहन जो हुआ सो हुआ। अब हम थोड़ा रहन, सहन, शोधन, उन्नयन और प्रबोधन भी सीख लें।

मनु के प्रति बहुत गुस्सा है, ठीक है । हमने भावावेश में और सामाजिक-राजनीतिक संदेश देने के लिए उनके नाम से चलने वाली पुस्तक को एक बार चंदन की चिता पर रखकर जला भी डाला। चलो वह भी ठीक। लेकिन यह क्या कि हम कुत्सित दुष्प्रचार का घिनौना तेल डाल-डाल कर जब-तब उसे जलाते रहें। उस किताब पर जूती रख कर कहें कि हम नारीवादी हैं और सभ्य हैं। किसने रोका है, खराब बातों को निकाल बाहर कीजिए।चाहें तो अच्छी बातों को रख लीजिए, उन्हें जीवन में भी उतारिए। उसे और बेहतर बनाइये. चाहे जैसी भी हो, अपनी धरोहरों और अतीत की गलतियों से निपटने के लिए हम रीकंसीलिएशन, सत्यशोधन और सत्याग्रह का सहारा लेना भी सीखें।

गांधी और अंबेडकर दोनों ने ही एक से ज्यादा अवसरों पर इसे स्वीकारा था कि मनुस्मृति के नाम से प्रचलित मौजूदा किताब वास्तव में मनु के अलावा मुख्य रूप से किसी भृगु के विचारों से भरी पोथी थी, जिसमें बाद में भी कई लोगों ने जोड़-तोड़ की।

मनुस्मृति पर अपनी स्थिति और स्पष्ट करते हुए गांधीजी ने कहा था –

‘मैं मनुस्मृति को शास्त्रों का हिस्सा अवश्य मानता हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं मनुस्मृति के नाम से चल रही किसी पुस्तक में छपे हर एक श्लोक को अक्षरशः सत्य मानता हूं. छपी हुई किताब में इतने विरोधाभास भरे पड़े हैं कि यदि आप एक हिस्से को स्वीकार करें, तो आपको उन अन्य हिस्सों को अस्वीकार करना ही पड़ेगा जो उससे बिल्कुल भी मेल नहीं खाते… दरअसल आज किसी के भी पास मूल ग्रंथ की प्रति है ही नहीं.’

मनुस्मृति के नाम से प्रचलित इसकी मौजूदा प्रतियां भारुचि, मेधातिथि, गोविंदराज एवं कूल्लूक भट्ट इत्यादि द्वारा अलग-अलग समय पर (7वीं से 13वीं सदी के बीच) किए गए संकलनों और भाष्यों (कमेंटरी) पर आधारित हैं।

वैदिक शास्त्र संस्कृत में हैं और संस्कृत के सम्बन्ध में बाबा साहब अम्बेडकर अज्ञानी थे जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है देखें –

“यदि कहा जाये कि मैं संस्कृत का विद्वान नहीं तो मैं मानने को तैयार हूँ परन्तु संस्कृत का विद्वान न होने से मैं इस विषय पर लिख क्यों नहीं सकता ?
संस्कृत का बहुत थोड़ा अंश है जो अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध नहीं है। इसलिए संस्कृत न जानना मुझे इस विषय पर न लिखने का अनाधिकारी नहीं ठहरा सकता।
अंग्रेजी अनुवादों का पंद्रह साल अध्ययन करने के बाद यह अधिकार मुझे अवश्य प्राप्त है |”

(शूद्रों की खोज, प्राक्कथन प्र.2, समता प्रकाशन नागपुर)

भीमराव के इस कथन से यह तो स्पष्ट है कि वह संस्कृत भाषा में अज्ञानी थे तथा उनका वैदिक शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान अंग्रेजी अनुवादों पर आधारित था।

तो अब बाबा साहेब जी ने मनुस्मृति का जो अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा वो मैक्समूलर का अनुवाद किया हुआ था, मैक्समूलर को संस्कृत का अच्छा ज्ञान था।

दुर्भाग्य से बाबासाहेब ने जो मनुस्मृति पढ़ी वो वही थी मैक्समूलर की एडिट की हुई। अर्थात मनुस्मृति का विरोध बाबासाहेब ने जानबूझकर कर नही बल्कि अंग्रेजो की साजिश में फंसकर किया।

यहाँ मैं भाषाओँ के सम्बन्ध में एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि संस्कृत भाषा में 1 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द हैं जबकि अंग्रेजी भाषा में मात्र 171476 शब्द हैं।

अब बुद्धजीवी यह विचार करें कि क्या संस्कृत शास्त्रों का अंग्रेजी में अनुवाद संभव है?

अगर कोई अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के आधार पर वैदिक शास्त्रों का अर्थ करने की जिद कर बैठे तो वह अर्थ नहीं अनर्थ कहलायेगा। संस्कृत में अज्ञानी होने के बावजूद पूर्वाग्रह से ग्रसित भीमराव मनुस्मृति के श्लोकों का अनर्थ कर बैठे और अपनी इसी अज्ञानता के चलते मनुस्मृति को जलाने की मूर्खता कर बैठे। भीमराव का मनुविरोध केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ था जिसका कोई आधार नहीं था!
उन पर तो बस मनुविरोध का भूत सवार था जो कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, देखें – “मुझ पर मनु का भूत सवार है और मुझ में इतनी शक्ति नहीं है कि मैं उसे उतार सकूं |” ( अम्बेडकर वांग्मय, खण्ड 1, प्र. 29 )

भीमराव के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि भीमराव पर भूत सवार था और उनका मनुविरोध निराधार था!

बाबा साहब हिन्दू धर्म शास्त्रों के सम्बन्ध में अज्ञानी थे इसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है!
देखें – “हिन्दू धर्म शास्त्र का मैं अधिकारी ज्ञाता नहीं” ( जातिभेद का उच्छेद, प्र. 101, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )

जब महात्मा गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर के मनुस्मृति अनुवाद पर आपत्ति जतायी तो बाबा साहब ने यह स्वयं स्वीकार किया कि मनुस्मृति के विषय पर पूर्ण अधिकार नहीं है, देखें –
“गाँधी जी की पहली आपत्ति यह है कि मैंने जो श्लोक चुने हैं वे अप्रमाणिक हैं, मैं यह मानता हूँ कि मेरा इस विषय पर पूर्ण अधिकार नहीं है” ( जातिभेद का उच्छेद, प्र. १ 120, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )!

पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता के कारण बाबा साहब ने मनु के अंधविरोध को ही अपना लक्ष्य बना लिया था और इसी अंधविरोध के कारण बाबा साहब ने स्वयं ही अपनी विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगा लिया!

जिसका एक उदहारण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

बाबा साहब ने जर्मन के प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रीडरिच नीत्से की तुलना महर्षि मनु से करते हुए कहा है कि “नीत्से की तुलना में मनु के महामानव का दर्शन अधिक नीच तथा भ्रष्ट है” ( अम्बेडकर वांग्मय, खण्ड 6, प्र. 101)

जिस नीत्से की तुलना में बाबा साहब मनु के दर्शन को नीच तथा भ्रष्ट बता रहे हैं उसी नीत्से ने मनुस्मृति के सम्बन्ध में कहा है – “CLOSE THE BIBLE AND OPEN THE CODE OF MANU” अर्थात बाइबिल को पढ़ना बंद करो और मनु के संविधान को पढ़ो ( The will to power, vol. 1, book 2nd, p. 126 )

“How wretched is the new testamant compared to manu. How faul it small !” अर्थात मनुस्मृति बाइबिल से बहुत उत्तम ग्रन्थ है | बाइबिल से तो अश्लीलता और बुराइयों की बदबू आती है ( wiyond nihilism nietzsche, without marks P41 )

नीत्से के इन कथनों से बुद्धजीवी यह अनुमान लगा सकते हैं कि बाबा साहब का मनुविरोध केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ था जो कि पूर्णतयः निराधार था। बाबा साहब ने अपने अंधविरोध के कारण मनुस्मृति जलाकर अपनी अपनी विद्वता पर स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगा लिया।

भला हो बाबा साहब आपका जो आपने अपने अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर सिक्खों की गुरुवाणी का अनुवाद नहीं किया अन्यथा आप उसे भी जला देते क्योंकि गुरुगोविन्द सिंह के दशम ग्रन्थ में एक पूरा काव्य सन्दर्भ मनु के विषय पर वर्णित है।

यहाँ कुछ विश्वप्रसिद्ध देशी विदेशी विद्वानों की सूची प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की महानता को स्वीकार किया है –
1.गौतम बुद्ध
2.बौद्ध महाकवि अश्वघोष
3.विश्वरूप
4.शबरस्वामी
5.विज्ञानेश्वर
6.आचार्य चाणक्य
7.राजा धारसेन ( 571 ई. )
8.शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह
9.गुरु गोविन्द सिंह
10.ऋषि दयानंद
11.स्वामी विवेकानंद
12.श्री अरविन्द
13.डॉ. राधाकृष्णन
14.जवाहर लाल नेहरु
15.मोहन दास करमचंद गाँधी
16.जस्टिस डी. एन. मुल्ला
17.जस्टिस एन. राघवाचार्य
18.पाश्चात्य इतिहासकार ए. बी. कीथ
19.जर्मन दार्शनिक नीत्से
20.भारत रत्न श्री पी. वी. काणे
21.डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकर
22.पाश्चात्य लेखक पी. थॉमस
23.रुसी विचारक पी. डी. औस्मेंसकी
24.ब्रिटिश लेखक डॉ. जी. एच. मीज
25.मैडम एनी बेसेंट
26.मैडम एच. पी. ब्लेवात्सकी
27.पुरातत्ववेत्ता गार्डन चाइल्ड
28.सर विलियम जोन्स
29.जी. सी. होग्टन
30.फ्रेंच विद्वान पार. ए. लोअसल्युर

ऐसे अनेक विश्वप्रसिद्ध विद्वानों ने मनुस्मृति की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है तथा मनुस्मृति को जलाने की बजाय उस पर शोध किया। इस सारी दुनिया में केवल एक ही ऐसा अद्भुत विद्वान था जिसने मनुस्मृति पर शोध करने की बजाय उसे जलाने में दिलचस्पी दिखाई और उस अद्भुत विद्वान का नाम था-डॉ. भीमराव अम्बेडकर।

मधुसूदन

भारत का कृषि विज्ञान और कृषि दर्शन

संसद में किसानों की आत्महत्याओं के चर्चे हो रहे हैं। सरकारें दोषी हैं निस्संदेह, नीतियों में गड्ढे हैं और गड्ढों की बनाई नीतियां हैं , इसमें शक नहीं। पर क्या कृषि को लेकर हमारा जो दृष्टिकोण था, वह भी नहीं बदल गया है??
ऋग्वेद की ऋचा कहती है कि जुए से दूर रहो, जितनी आत्महत्याएं होती हैं, उनका एक बड़ा प्रतिशत नशे या जुए जैसी लतों की ही वजह से होती हैं।
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्‌ कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमानः । ऋग्वेद-३४-१३।
अर्थात जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ ।

ऋग्वेद में क्षेत्रपति, सीता और शुनासीर को लक्ष्यकर रची गई एक ऋचा (४।५७।–८) है जिससे वैदिक आर्यों के कृषिविषयक ज्ञान का बोध होता है

शुनं वाहा: शुनं नर: शुनं कृषतु लाङ्‌गलम्‌।
शनुं वरत्रा बध्यंतां शुनमष्ट्रामुदिङ्‌य॥
शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद् दिवि चक्रयु: पय।
तेने मामुप सिंचतं।
अर्वाची सभुगे भव सीते वंदामहे त्वा।
यथा न: सुभगाससि यथा न: सुफलाससि।।
इन्द्र: सीतां नि गृह्‌ णातु तां पूषानु यच्छत।
सा न: पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्‌।।
शुनं न: फाला वि कृषन्तु भूमिं।।
शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहै:।।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभि:।
शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्‌

एक अन्य ऋचा से प्रकट होता है कि उस समय जौ हल से जोताई करके उपजाया जाता था-

एवं वृकेणश्विना वपन्तेषं
दुहंता मनुषाय दस्त्रा।
अभिदस्युं वकुरेणा धमन्तोरू
ज्योतिश्चक्रथुरार्याय।।

अथर्वेद से ज्ञात होता है कि जौ, धान, दाल और तिल तत्कालीन मुख्य शस्य थे-

व्राहीमतं यव मत्त मथो
माषमथों विलम्‌।
एष वां भागो निहितो रन्नधेयाय
दन्तौ माहिसिष्टं पितरं मातरंच ।।

अथर्ववेद में खाद का भी संकेत मिलता है जिससे प्रकट है कि अधिक अन्न पैदा करने के लिए लोग खाद का भी उपयोग करते थे-

संजग्माना अबिभ्युषीरस्मिन्‌
गोष्ठं करिषिणि:।
बिभ्रंती सोभ्यं।
मध्वनमीवा उपेतन ।।

और आज हमारी समस्याओं के सबसे बड़े कारणों में से एक यह है कि हम मिश्रित खेती छोड़ मोनो क्राप फार्मिंग अधिक करते हैं।

गृह्य एवं श्रौत सूत्रों में कृषि से संबंधित धार्मिक कृत्यों का विस्तार के साथ उल्लेख हुआ है। उसमें वर्षा के निमित्त विधिविधान की तो चर्चा है ही, इस बात का भी उल्लेख है कि चूहों और पक्षियों से खेत में लगे अन्न की रक्षा कैसे की जाए।

पाणिनि की अष्टाध्यायी में कृषि संबंधी अनेक शब्दों की चर्चा है जिससे तत्कालीन कृषि व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।

भारत में ऋग्वैदिक काल से ही कृषि पारिवारिक उद्योग रहा है और बहुत कुछ आज भी उसका रूप है। लोगों को कृषि संबंधी जो अनुभव होते रहें हैं उन्हें वे अपने बच्चों को बताते रहे हैं और उनके अनुभव लोगों में प्रचलित होते रहे। उन अनुभवों ने कालांतर में लोकोक्तियों और कहावतों का रूप धारण कर लिया जो विविध भाषाभाषियों के बीच किसी न किसी कृषि पंडित के नाम प्रचलित है और किसानों जिह्वा पर बने हुए हैं।

कृषि सम्पत्ति और मेधा प्रदान करती है और कृषि ही मानव जीवन का आधार है ।मानव सभ्यता की ओर बढ़ा, तभी से कृषि प्रारंभ हुई और भारत में कृषि एक विज्ञान के रूप में विकसित हुई ।

यूरोपीय वनस्पति विज्ञान के जनक रोम्सबर्ग के अनुसार इसी पद्धति को पश्चिम ने बाद के दिनों में अपनाया ।मौर्य राजाओं के काल में कौटिल्य अर्थशास्त्र में कृषि, कृषि उत्पाद आदि को बढ़ावा देने हेतु कृषि अधिकारी की नियुक्ति का उल्लेख मिलता है ।कृषि हेतु सिचाई की व्यवस्था विकसित की गयी ।

यूनानी यात्री मेगस्थनीज लिखता है, मुख्य नाले और उसकी शाखाओं में जल के समान वितरण को निश्चित करने के लिए व नदी और कुंओं के निरीक्षण के लिए राजा द्वारा अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी ।कृषि के संदर्भ में नारदस्मृति, विष्णु धर्मोत्तर, अग्नि पुराण आदि में उल्लेख मिलता है । कृषिपरायण कृषि के संदर्भ में एक संदर्भ ग्रंथ बन गया । इस ग्रंथ में कुछ विशेष बातें कृषि के संदर्भ में कही गयी हैं ।जोताई – इसमें कितने क्षेत्र की जोताई करना, उस हेतु हल, उसके अंग आदि का वर्णन है । इसी प्रकार जोतने वाले बैल, उनका रंग, प्रकृति तथा कृषि कार्य करवाते समय उने प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखने का वर्णन इस ग्रंथ में मिलता है ।

वर्षा के बारे में भविष्यवाणी – प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण, ग्रहों की गति तथा प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का गहरा अभ्यास प्राचीन काल के व्यक्तियों ने किया था और उस आधार पर वे भविष्यवाणियाँ करते थे ।जिस वर्ष सूर्य अधिपति होगा, उस वर्ष में वर्षा कम होगी और मानवों को कष्ट सहना होगा । जिस वर्ष चन्द्रमा अधिपति होगा, उस वर्ष अच्छी वर्षा और वनस्पति की वृद्धि होगी । लोग स्वस्थ रहेंगे । उसी प्रकार बुध, बृहस्पति और शुक्र वर्षाधिपति होने पर भी स्थिति ठीक रहेगी । परन्तु जिस वर्ष शनि वर्षाधिपति होगा, हर जगह विपत्ति होगी ।जोतने का समय – नक्षत्र तथा काल के निरीक्षण के आधार पर जोताई के लिए कौन सा समय उपयुक्त रहेगा, उसका निर्धारण उन्होंने किया ।बीजवपन – उत्तम बीज संग्रह हेतु पराशर ऋषि गर्ग ऋषि का मत प्रकट करते हैं कि गीज को माघ ( जनवरी – फरवरी ) या फाल्गुन ( फरवरी मार्च ) माह में संग्रहीता करके धूप में सुखाना चाहिए तथा तथा उन बीजों को बाद में अच्छी जगह सुरक्षित रखना चाहिए ।

” कृषि पाराशर ” में वर्षा को मापने का वर्णन भी मिलता है अथ जलाढक निर्णयःशतयोजनविस्तीर्णं त्रिंशद्योजनमुच्छि्रतम्‌ ।अढकस्य भवेन्मानं मुनिभिः परिकीर्तितक्‌ ॥अर्थात – पूर्व में ऋषियों ने वर्षा को मापने का पैमाना तय किया है । अढकक याने सौ योजन विस्तीर्ण तथा ३०० योजन ऊँचाई में वर्षा के पानी की मात्रा ।योजन अर्थात्‌‌ – १ अंगुली की चौड़ाई१ द्रोण = ४ अढक = ६.४ से. मी.आजकल वर्षा मापन भी इतना ही आता है ।कौटिलय के अर्थशास्त्र में द्रोण आधार पर वर्षा मापने का उल्लेख तथा देश में कहाँ कहाँ कितनी वर्षा होती है, इसका उल्लेख भी मिलता है ।उपरोपण ( ग्राफ्टिंग ) – वराहमिहिर अपनी वृहत्‌ संहिता में उपरोपण की दो विधियाँ बताते हैं ।( १ ) जड़ से पेड़ में काटना और दूसरे को तने ( trunk ) से काटकर सन्निविष्ट ( insert ) करना ।( २ ) Inserting the cutting of tree into the stem of another जहाँ दोनों जुडे़गे वहाँ मिट्टी और गोबर से उनको बंदकर आच्छादित करना ।इसी के वराहमिहिर किस मौसम में किस प्रकार के पौधे की उपरोपण करना चाहिए, इसका भी उल्लेख करते हैं । वे कहते हैं ।इसी के वराहमिहिर किस मौसम में किस प्रकार के पौधे की उपरोपण करना चाहिए, इसका भी उल्लेख करते हैं । वे कहते हैं ।शिशिर ऋतु ( दिसम्बर – जनवरी ) ——— जिनकी शाखांए बहुत हैं उनका उपरोपण करना चाहिएशरद ऋतु ( अगस्त – सितम्बर )वराहमिहिर किस मौसम में कितना पानी प्रतिरोपण किए पौधों को देना चाहिए, इसका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि ” गरमी में प्रतिरोपण किए गए पौधे को प्रतिदिन सुबह तथा शाम को पानी दिया जाए । शीत ऋतु में एक दिन छोड़कर तथा वर्षा काम में जब जब मिट्टी सूखी हो ।

“इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल से भारत में कृषि एक विज्ञान के रूप में विकसित हुआ । जिसके कारण हजारों वर्ष बीतने के बाद भी हमारे यहाँ भूमि की उर्वरा शक्ति अक्षुण्ण बनी रही, जबकि कुछ दशाब्दियों में ही अमेरिका में लाखों हेक्टेयर भूमि बंजर हो गयी है ।

भारतीय कृषि पद्धति की विशेषता एवं इसके उपकरणों का जो प्रशंसापूर्ण उल्लेख अंगेजों द्वारा किया गया , उसका उद्धरण धर्मपाल जी की पुस्तक ” इण्डियन साइंस एण्ड टैक्नोलॉजी उन दी एटीन्थ सेन्चुरी ” मे दिया गया है । उस समय भारत कृषि के सुविकसित साधनों में दुनिया में अग्रणी था । कृषि क्षेत्र में पंक्ति में बोने के तरीके को इस क्षेत्र में बहुत उपयोगी और उपयोगी अनुसंधान माना जाता है । आस्ट्रिया में पहले पहल इसका प्रयोग सन्‌ १६६२ में हुआ था तथा इंग्लैण्ड में १७३० में हुआ हालाकि इसका व्यापक प्रचार प्रसार वहाँ इसके ५० वर्ष बाद हो पाया । पर मेजर जनरल अलेक्झेंडर वाकर के अनुसार पंक्ति में बोने का प्रयोग भारत में अत्यंत प्राचीन काल से ही होता आया है । थामॅमस हाल्काट ने १७९७ में इंग्लैण्ड के कृषि बोर्ड को लिखे एक पत्र में बताया कि, भारत इसका प्रयोग प्राचीन काल से ही होता रहा है । उसने बोर्ड को पंक्तियुक्त हलों के तीन सेट लन्दन भेजे ताकि इन हलों की नकल अंग्रेज कर सकें, क्योंकि ये अंग्रेजी हलों की अपेक्षा अधिक उपयोंगी और सस्ते थें ।सर वाकर लिखते हैं ” भारत में शायद विश्व के किसी भी देश से अधिक किस्मों का अनाज बोया जाता है और तरत – तरह की पौष्टिक जड़ों वाली फसलों का भी यहाँ प्रचलन है । वाकर की समझ में नहीं आया कि हम भारत को क्या दे सकते हैं क्योंकि जो खाद्यान्न हमारे यहाँ हैं, वे तो यहाँ हैं ही, और भी अनेक प्रकार के अन्न यहाँ हैं । ”
कृषि केवल विज्ञान ही नहीं कृषि दर्शन भी है।

मधुसूदन उपाध्याय

Legacies Of Indian Science: Perpetual Motion Machines

आरोपों-प्रत्यारोपों का संग्राम फ़िर से चरम पर है। बीजेपी के शिक्षा राज्यमंत्री श्री वासुदेव देवनानी का “विवादित” बयान है कि “ग्रेविटी” की ख़ोज न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पहले “ब्रह्मगुप्त” ने की थी।
तो क्या इसमें कुछ विवादित अंश है?
वस्तुतः विवादित से कहीं ज़्यादा “अवैज्ञानिक समझ” का प्रदर्शन है।
.
“सेब गिरता है” यह एक फैक्ट है।
“सेब किस कारण (पृथ्वी) गिरता है” यह बूझना हाइपोथिसिस कहलाता है।
और.. “सेब किन नियमों के तहत गिरता है” का प्रतिपादन “थ्योरी” कहलाता है।
.
तो मुख्य अंतर यही है मित्रों। पृथ्वी में आकर्षण है, इसका निरिक्षण तो आदिकाल से ही मनुष्य अपने दैनिक अनुभवों में करता आया है। न्यूटन का महत्त्व तो इतना है कि उन्होंने मानव इतिहास में प्रथम बार किसी प्राकृतिक घटना को “गणितीय सूत्रों” में व्यक्त कर पाया था जिस कारण न्यूटन को सच्चे अर्थों में विश्व का प्रथम वैज्ञानिक कहा जाता है।
.
यहाँ तक तो ठीक है लेकिन मैं सोशल मीडिया पर चलन देख रहा हूँ कि बीजेपी के मंत्री का मख़ौल उड़ाने के बहाने भारतीय ज्ञान-परम्परा को कूपमंडूक घोषित करने के प्रयास हो रहे हैं। भारतीय मनीषियों की नैसर्गिक मेधा पर ही सवाल खड़े किये जा रहे है अंतएव मैंने निश्चय किया है कि मैं प्राचीन भारतीय विद्वानों के कुछ अनसुने-अनकहे पहलुओं से आपका परिचय कराऊँ।
.
उससे पहले हमें बात करनी होगी.. Perpetual Motion Machines की।
चित्र में आप देख सकतें हैं कि एक चक्र के साथ कुछ फ्लास्क अटैच हैं जिन फ्लास्कों में मरकरी (पारा) नामक द्रव मौजूद है। चक्र की संरचना कुछ इस प्रकार है कि द्रव अवस्था में मौजूद पारा चक्र की गति के दौरान लुढक कर, चक्र के एक भाग को हमेशा भारी बनाये रखता है। तो अगर आप चक्र को एक बार घुमा के छोड़ दें तो परिकल्पना के तौर पर क्या माना जा सकता है कि पारे तथा चक्र की ज्योमेट्री के कारण यह चक्र अनंतकाल तक बिना रुके घूमता रहेगा?
नही.. चक्र वायु के अणुओं से टकरा कर अपना “गतिज ऊर्जा” खोता रहेगा तथा साथ-साथ अगर चक्र का एक सिरा भारी है तो चक्र का द्रव्यमान केंद्र अपने-आप सेंटर से हटकर थोड़ा नीचे की ओर प्रतिस्थापित हो जाएगा, जिस कारण चक्र गोल घूमने की बजाय कुछ देर में “पेंडुलम” की भाँति दोलन कर शांत हो जाएगा।
आईडिया फ्लॉप है !!! पर यह काल्पनिक प्रयोग इस संभावना को अवश्य जन्म देता है कि क्या ऐसी “सतत गतिमान मशीनें” अर्थात Perpetual Motion Machines बनाना संभव है जो बिना किसी ऊर्जा के इस्तेमाल के अनन्तकाल तक गतिमान रहकर मानवों की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कर सकें?
.
परपेचुअल मशीनों के अनगिनत प्रस्तावित मॉडल्स आज चर्चाओं के केंद्र में हैं जिनकी विस्तृत चर्चा इस पोस्ट में संभव नही है। इसलिए मैं इस पोस्ट के प्रथम कमेंट में एक वीडियो लिंक पोस्ट कर रहा हूँ जिसे देख आप इन मशीनों के कांसेप्ट तथा प्रायोगिक अवरोधों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
.
ये विषय अपने आप में काफ़ी रोचक और वृहद है जिस कारण इसे मैं भविष्य में किसी विस्तृत लेखमाला में पिरोने की इच्छा रखता हूँ। फ़िलहाल स्पेस की सीमित उपलब्धता के कारण हम सिर्फ प्रथम प्रकार की परपेचुअल मशीनों की ही चर्चा करेंगे जिनके अनुसार “बिना कोई ऊर्जा इस्तेमाल किये कार्य किया जा सकता है”
.
क्या आप ऐसा लाइट बल्ब बना सकतें हैं जो प्रकाश भी दे.. खुद के प्रकाश से ही आसपास मौजूद सोलर पैनल्स को भी चार्ज करे? और उन्ही सोलर पैनल्स से स्वयं को चार्ज भी कर सके?
सुनने में ये कल्पनायें बेहद लुभावनी लगती हैं लेकिन इन सभी अव्यवहारिक कल्पनाओं में सबसे बड़ी ख़ामी यह है कि ये थर्मोडायनमिक्स के कुछ आधारभूत नियमों का अतिक्रमण करती हैं।
1: ऊर्जा को ना उत्पन्न किया जा सकता है और ना ही नष्ट… तो एक निश्चित मात्रा की ऊर्जा से शुरू कर अधिक ऊर्जा को कैसे निर्मित किया जा सकता है?
2: ऊर्जा हमेशा ज़्यादा से कम की ओर बहती है… कम से ज़्यादा की ओर नही। ऊर्जा दस रूपए का वो नोट है जिसे खुला कर आप एक रूपए के दस सिक्कों में तो परिवर्त्तित कर सकतें हैं लेकिन दस सिक्के आपस में मिलकर दस का नोट नही बना सकते।
Entropy Must Increase… It Never Decreases!!!
.
ब्रह्माण्ड के आधारभूत नियमों के उल्लंघन के कारण वैज्ञानिकों द्वारा परपेचुअल मशीनों का कांसेप्ट सिरे से नकार दिया जाता है।
फ़िर भी.. कुछ वैज्ञानिक आशावान हैं कि शायद भविष्य में हम ब्रह्माण्ड के आधारभूत नियमों के ढाँचे में कोई लूपहोल ख़ोज पाएं क्योंकि ब्रह्माण्ड में रहस्यों के कई आयाम ऐसे हैं जहाँ ब्रह्माण्ड के नियमों का ढांचा ही चरमरा कर ध्वस्त हो जाता है।
.
प्रसिद्ध साइंस-फिक्शन राइटर आइज़क असिमोव की कहानी The God Themselves का नायक 2070 में एक ऐसी मशीन का निर्माण करता है जो ब्रह्माण्ड में उपलब्ध ऊर्जा के इस्तेमाल के बिना ही सभ्यताओं की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम थी। नायक का ये आविष्कार उसे रातोंरात चर्चित कर देता है परंतु जिज्ञासु लोग यह सवाल भी उठाते हैं कि ये “निःशुल्क ऊर्जा” आख़िर आ कहाँ से रही है? और लोगों को पता चलता है कि इस ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत एक ऐसा छेद है जो हमारे ब्रह्माण्ड को समानांतर ब्रह्माण्ड से जोड़ कर समानांतर ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को इस ब्रह्माण्ड में आने का मार्ग प्रदान कर रहा है और यही छेद अंततः हमारे ब्रह्माण्ड की मृत्यु का कारण बनेगा।
(इससे अधिक के लिए स्वयं नॉवेल पढ़ें)
यह कहानी एक बेहद रोचक प्रश्न को जन्म देती है.. क्या ऐसा संभव है कि हम हमारे ब्रह्माण्ड में उपलब्ध ऊर्जा के अतिरिक्त किसी अन्य ऊर्जा स्त्रोत के इस्तेमाल से अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कर पाएं?
एक संभावित स्त्रोत ऐसा है और उसका नाम है।
निर्वात की ऊर्जा अथवा डार्क एनर्जी !!!
.
जब हम स्पेसटाइम अथवा ब्रह्माण्ड के मूल ढाँचे को निरंतर सूक्ष्मतर स्तर पर आवर्धित (Magnify) करते जाते हैं तो एक समय ऐसा आता है जब हम पाते हैं कि ऊर्जा के कण निरंतर अस्तित्त्व में आते हैं तथा आपस में टकरा कर शुद्ध ऊर्जा में विलीन होकर लुप्त हो जाते हैं।
कणों का ये प्राकट्य-लोप इतना जल्दी होता है कि इन्हें दरकिनार कर देने से भी हमारी गणनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
पर ये ऊर्जा वास्तविक है और प्रायोगिक रूप से निरीक्षित भी !!!
.
ब्रह्माण्ड की 68% भौतिक ऊर्जा इन्ही “क्वांटम फ्लक्चुएशन्स” के रूप में ब्रह्माण्ड के मूल ढाँचे स्पेसटाइम में ही निहित है जिस कारण इसे वैक्यूम एनर्जी अथवा निर्वात की ऊर्जा भी कहा जाता है। यही निर्वात की ऊर्जा वर्त्तमान में हमारे ब्रह्माण्ड के निरंतर प्रसार के लिए भी उत्तरदायी है। यह प्रसार किस प्रकार होता है? इसके स्पष्टीकरण के साथ विश्व में पहली बार “डार्क एनर्जी” के स्वरुप, गुणधर्मों तथा मेकेनिस्म की सर्वसुलभ और सुग्राह्य व्याख्या आप मेरी आने वाली पुस्तक “बेचैन बन्दर” में पढ़ेंगे।
.
हम जानते हैं कि हमारे आस-पास यह ऊर्जा मौजूद है लेकिन हम यह नही जानते कि इस ऊर्जा के इस्तेमाल से परपेचुअल मशीनों का निर्माण कैसे किया जा सकता है? बेहद मुश्किल है पर फ़िर भी वैज्ञानिकों ने इसे असंभव की श्रेणी में नही रखा है। सभ्यताओं के वर्गीकरण संबंधी अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कथन है कि किसी भी विकसित सभ्यता की प्रगति का अंतिम चरण “परपेचुअल मोशन मशीनों” का निर्माण होगा जिसके प्रयोग से वो अतिविकसित सभ्यताएं बिना किसी सूर्य के अनंतकाल तक अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम होंगी।
.
इस प्रश्न का सही उत्तर तो समय के गर्भ में छुपा हुआ है लेकिन मैंने आपको ये सब आखिर क्यों बताया है?
वो इसलिए… “परपेचुअल मशीन” जैसे असाधारण कांसेप्ट की प्रथम परिकल्पना करने वाले विश्व के प्रथम मनुष्य और कोई नही बल्कि ब्रह्मगुप्त स्वयं थे जिन्होंने इस सिद्धान्त का वर्णन अपनी पुस्तक ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के “यंत्राध्याय” नामक चैप्टर में किया है।
तत्पश्चात इस सिद्धान्त का उत्तरोत्तर वर्णन क्रमशः लल्ला तथा भास्कर द्वितीय के द्वारा भी किया गया है।
.
भास्कर अथवा ब्रह्मगुप्त को महान सिद्ध करने के लिए न्यूटन की खोजों का श्रेय जबरदस्ती उनके माथे मढ़ने की ज़रुरत नही। ये दोनों भारतीय मेधावी मनुष्य अपने समय से हजार साल आगे की सोच रखते थे। ज़रुरत बस वास्तविक अध्ययन द्वारा भारतीय मनीषियों के वास्तविक योगदान को वैश्विक मंच पर ले जाने की है।
.
विज्ञान और तकनीक के इतिहास में “एक पत्थर द्वारा दूर रहकर भी किसी को चोट पहुँचाई जा सकती है” सोचने वाले मनुष्य का मोल आधुनिक मिसाइल बनाने वाले मनुष्य से कहीं कमतर नही है।
और ना ही प्रथम बार पत्थर रगड़कर आग जलाने वाले मनुष्य का योगदान न्यूक्लियर ऊर्जा की खोज करने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन से कमतर है।
भास्कर हों अथवा न्यूटन अथवा लाखों वर्ष पूर्व सर्द दोपहरी में अपनी गुफा में पत्थर को तराशकर कुल्हाड़ी की शक्ल देता प्राचीन मनुष्य… सभी ने अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार मानव प्रगति की यात्रा में सार्थक योगदान ही दिया है।
.
विज्ञान एक सतत यात्रा है। छोटा हो अथवा बड़ा.. हर योगदान महत्त्व रखता है।
Every Contribution Counts!!!
And As Always
Thanks For Reading !!
************************
#झकझकिया #विजय_सिंह_ठकुराय